क्यों उड़ गई ?

Ranjana Mathur

रचनाकार- Ranjana Mathur

विधा- कहानी

-= क्यों उड़ गई =-

‌ जून का महीना था। घर की छत पर पड़ोस से आ रहे आम के पेड़ पर एक चिड़िया चिरौंटे का जोड़ा तिनके ला-ला कर इकट्ठे कर रहा था । नन्ही बुलबुल अपने छोटे भाइयों के साथ उन्हें रोजाना देखा करती। तीनों भाई उससे छोटे होने के कारण जीजी उनकी हेड हुआ करती थी। वह जो कहती सभी भाई मानते। चिड़िया के उस जोड़े ने अंततःपेड़ पर घोंसला बना ही लिया।
चिड़िया ने अंडे दिए। दोनों उनकी रखवाली रात-दिन करते। बुलबुल अपने छोटे भाइयों के साथ छत की मुंडेर पर चढ़ कर उन्हें देखती और मां की तरह हिदायतें देती – "भैया कोई अंडों को हाथ मत लगाना वरना चिड़िया को इंसान के हाथ की खुशबू आ जाएगी, फिर वह अंडे को पालेगी नहीं फेंक देगी। फिर अंडे में से बच्चा कैसे निकलेगा।" भाई हामी में सिर हिला देते। और फिर वह दिन भी आ गया जब अंडों में से बच्चे निकल आए। अब चारों भाई बहन चिड़िया चिरौंटे का बच्चों को दाना चुगाना बड़े कौतुहल से देखा करते। छोटी चोंच खोल कर बच्चे माँ की चोंच से चुग्गा खा लेते।
‌ एक रोज तेज हवा चलने से चार बच्चों में से एक नीचे जा गिरा। भाई बहन दौड़ पड़े। बुलबुल बोल पड़ी – "अरे भैया अब क्या करें। हम छिप जाते हैं। इसके मम्मी पापा इसे उठा लेंगे।" बाल बुद्धि थी। चिड़िया चिरौंटे का जोड़ा चींचीं करता हुआ यहां वहां फड़फड़ाता रहा किन्तु उस बच्चे को घोंसले में वापस ले जाना असंभव था। बच्चा भी धीमे स्वर में चींचीं कर रहा था। बुलबुल ने मम्मी से पूछा तो उन्होंने रुई में बच्चे को रख दिया। अब भाई बहन रात दिन उसकी सेवा चाकरी करते। उसकी चोंच खुलती तो उसमें रुई से पानी व दूध की बूँदें डाल दिया करते। खैर जनाब, शनैः शनैः बच्चा पनपता गया और कालांतर में बड़ी चिड़िया बन गया। बच्चों ने उसे एक पिंजरे में डाल कर पहचान के लिए ब्लू इंक के छींटे डाल दिए थे । वे पिंजरे को रोजाना छत पर रख आते। बाहरी चिड़ियाऐं आ आकर पिंजरे के आसपास बैठकर चीं चीं करतीं।वह भी उन्हें देखकर अपने पंख फड़फड़ा कर खुश होता। उनमें से एक चिड़िया उस बच्चे की चोंच में रोजाना चुग्गा डालती। यह देख बुलबुल भाइयों से कहती-"भैया शायद यही इसकी मां होगी।"

‌ संयोग से एक दिन बच्चे पिंजरे का दरवाजा ठीक से बंद करना भूल गए। बाहरी चिड़िया आईं और उन्हें आते देख रोज़ की तरह बच्चा अपने पंख फड़फड़ा कर खुश हुआ और थोड़ा आगे बढ़ते ही खुले दरवाजे से बाहर निकल आया। छोटे भाइयों ने दीदी को आवाज दी परन्तु क्या हो सकता था। बच्चा चिड़ियाओं के साथ फुर्र हो गया। भाई बहन बहुत दुखी हुए। उनका बच्चेे से बड़ा लगाव हो गया था। उस दिन किसी ने ठीक से खाना नहीं खाया। बेचारों की इतनी कड़ी मेहनत जो बेकार चली गई। अब वे रोज वह खाली पिंजरा छत पर रखने लगे । चिड़ियाओं के साथ वह बच्चा प्रतिदिन आता था। वह अकेला उन भाई बहनों के नजदीक आता फिर धीरे से उड़ जाता किन्तु पिंजरे के आसपास खूब चक्कर काटता और उस पर चोंच मारता।
‌छोटे भाई अक्सर उस की याद करके यही कहते- "जीजी वह क्यों उड़ गई।" बेचारी बहन निरुत्तर थी।

—-रंजना माथुर दिनांक 25 /07 /2017
(मेरी स्व रचित व मौलिक रचना )
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Ranjana Mathur
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भारत संचार निगम लिमिटेड से रिटायर्ड ओ एस। वर्तमान में अजमेर में निवास। प्रारंभ से ही सर्व प्रिय शौक - लेखन कार्य। पूर्व में "नई दुनिया" एवं "राजस्थान पत्रिका "समाचार-पत्रों व " सरिता" में रचनाएँ प्रकाशित। जयपुर के पाक्षिक पत्र "कायस्थ टुडे" एवं फेसबुक ग्रुप्स "विश्व हिंदी संस्थान कनाडा" एवं "प्रयास" में अनवरत लेखन कार्य। लघु कथा, कहानी, कविता, लेख, दोहे, गज़ल, वर्ण पिरामिड, हाइकू लेखन। "माँ शारदे की असीम अनुकम्पा से मेरे अंतर्मन में उठने वाले उदगारों की परिणति हैं मेरी ये कृतियाँ।" जय वीणा पाणि माता!!!

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