क्यूं दिखती खुशी में कमी-सी है ? क्यूं आँखों में भी थोड़ी नमी-सी है ?

पूनम झा

रचनाकार- पूनम झा

विधा- गज़ल/गीतिका

" गजल "
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क्यूं दिखती खुशी में कमी-सी है ?
क्यूं आँखों में भी थोड़ी नमी-सी है ?
*
हँस लेते हैं अश्क पीकर, पर ये
जिंदगी तो लगती अनमनी-सी है।
*
दिल की बात दिल में दबी रहती
अपनों में तो गहमागहमी -सी है।
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सीख लिया अब काँटों पर चलना
देखो फूलों पर तो गर्द जमी-सी है।
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कोशिश रहता गमे दिल न बने पर
टटोलते नब्ज तो लगता थमी-सी है।
*
जीते हैं हम सभी,हँसते हैं हम सभी
पर अश्क भी आँखों में घुटी-सी है।
*
जुबां को भी रोक देता है दिल,क्यूं
दिल इतनी सहमी-सहमी -सी है ?
*
सवाल होता कभी खुद से तो कभी
खुदा से,कयूं ये जमीं हिल रही-सी है ।
*
मिल जाए जवाब तो बताना "पूनम"
को भी क्यूं हर जगह सनसनी-सी है।
#पूनम_झा । कोटा, राजस्थान। 16-11-16
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पूनम झा
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मैं पूनम झा कोटा,राजस्थान (जन्मस्थान: मधुबनी,बिहार) से । सामने दिखती हुई सच्चाई के प्रति मेरे मन में जो भाव आते हैं उसे शब्दों में पिरोती हूँ और यही शब्दों की माला रचना के कई रूपों में उभर कर आती है। मैं ब्लॉग भी लिखती हूँ | इसका श्रेय मेरी प्यारी बेटी को जाता है । उसी ने मुझे ब्लॉग लिखने को उत्प्रेरित किया। कभी कभी पत्रिकाओं में मेरी रचना प्रकाशित होती रहती है | ब्लॉग- mannkibhasha.blogspot.com

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