कौन अपने- कौन गैर

Dinesh Sharma

रचनाकार- Dinesh Sharma

विधा- कविता

दिल में याद बना लेते है
गैर भी…
अपने भी…
कुछ चुभते है
कुछ यादगार बन जाते है
अपने भी-गैर भी
पहचान न पाये अपनों को भी
गैरो को भी
अपनों में गैर मिले,
गैरो में कमाल के अपने मिले
दोनों के अर्थ के मायने बदल दिये
अपनों के
गैरो के
अपनों को अपना कहे या गैरो को अपना
अब तो अपना भी लगता खुली आँखों का
सपना….

^^^^दिनेश शर्मा^^^^

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Dinesh Sharma
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सब रस लेखनी*** जब मन चाहा कुछ लिख देते है, रह जाती है कमियाँ नजरअंदाज करना प्यारे दोस्तों। ऍम कॉम , व्यापार, निवास गंगा के चरणों मे हरिद्वार।।

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2 comments
  1. यक़ीनन ,,अपना या पराया,,समय पर ख़ुद अपनी हक़ीक़त ज़ाहिर कर देता है,,,