कैसे मुकर जाओगे — डी के निवातिया

डी. के. निवातिया

रचनाकार- डी. के. निवातिया

विधा- गज़ल/गीतिका

यंहा के तो तुम बादशाह हो बड़े शान से गुजर जाओगे ।
ये तो बताओ खुदा कि अदालत में कैसे मुकर जाओगे

चार दिन की जिंदगानी है मन माफिक गुजार लो प्यारे।
आयेगा वक्त ऐसा भी खुद की ही नजर से उतर जाओगे ।।

लूट खसौट का ज़माना है जी भर के हाथ आजमा ले ।
एक न एक दिन तो जमाने के आगे हो मुखर जाओगे।।

ये जो रंग चढ़ा है तुम्हारे कँवल पर सुर्ख गुलाब सा।
लगी जो बद्दुआ गरीब की सूखे पत्तो से बिखर जाओगे।।

असर तो हमेशा न किसी का रहा है और न ही रहेगा।
टूटेगा जिस रोज़ अहम खुद इस वहम से उबर जाओगे ।।

आये थे खाली हाथ जहाँ में, खाली हाथ ही जाना है।
होगा ये इल्म जिस रोज़ खुद ही रब के दर पसर जाओगे

वक्त अभी भी बाकि है खुदा की इबादत करने के लिये ।
मान लो सलाह “धर्म” की, इस जग में सुधर जाओगे ।।

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डी के निवातिया

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डी. के. निवातिया
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नाम: डी. के. निवातिया पिता का नाम : श्री जयप्रकाश जन्म स्थान : मेरठ , उत्तर प्रदेश (भारत) शिक्षा: एम. ए., बी.एड. रूचि :- लेखन एव पाठन कार्य समस्त कवियों, लेखको एवं पाठको के द्वारा प्राप्त टिप्पणी एव सुझावों का ह्रदय से आभारी तथा प्रतिक्रियाओ का आकांक्षी । आप मुझ से जुड़ने एवं मेरे विचारो के लिए ट्वीटर हैंडल @nivatiya_dk पर फॉलो कर सकते है. मेल आई डी. dknivatiya@gmail.com

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