केवल माँ को ज्ञात

बसंत कुमार शर्मा

रचनाकार- बसंत कुमार शर्मा

विधा- दोहे

एक कला संसार में, केवल माँ को ज्ञात
बिन भाषा बिन बोल के, समझे सारी बात

कहाँ रहे सद्भावना, कहाँ रहे सद्भाव
जब फूलों के गाँव भी, होता हो पथराव

थोड़े दिन ही रह सका, मौसम यहाँ हसीन
ऋतु बसंत के बाद में, जमकर तपी जमीन

तपते पत्थर हैं कहीं, कहीं बिछे कालीन
आदिकाल से चल रहा, कुछ भी नहीं नवीन

जाता है अस्तित्व मिट, छोड़ी अगर जमीन
सागर में मिलाकर हुईं, नदियाँ सभी विलीन

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बसंत कुमार शर्मा
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भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में , जबलपुर, पश्चिम मध्य रेल पर उप मुख्य परिचालन प्रबंधक के पद पर कार्यरत, गीत, गजल/गीतिका, दोहे, लघुकथा एवं व्यंग्य लेखन

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