कुण्डलिया छंद के बारे में…

सतीश तिवारी 'सरस'

रचनाकार- सतीश तिवारी 'सरस'

विधा- लेख

प्रिय मित्रो,
मैं आपसे 'कुण्डलिया छंद' के बारे में कुछ बातें साझा करना चाहता हूँ.इतना सब जानते हैं कि *दोहा-रोला* से मिलकर बने छंद को *कुण्डलिया* कहते हैं,जिसमें दोहे का प्रथम शब्द या पद अंत में आता है और दोहे का उत्तर पद रोला का पूर्व पद होता है.पर सच पूछा जाये तो निर्दोष कुण्डलिया इतनी ही बातों पर सम्पन्न नहीं हो जाती.जैसा कि मैंने पहले कहा कि कुण्डलियाका पहला खंड दोहा होता है ।जिसके तहत प्रथम और तीसरा चरण 13/13 मात्राओं का जो विषम और दूसरा व चौथा चरण 11/11 मात्राओं का जो सम होते हैं और इनमें तुक होता है.यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि विषम चरणों के अंत में जगण (ISI) नहीँ होगा और दो गुरु भी नहीं होगा.देखिये मेरी एक दोषपूर्ण कुण्डलिया-

पढ़ना बेहद ज़रूरी,लिखने से भी पूर्व.
कई बार लिखकर मिटा,रचना बने अपूर्व.
रचना बने अपूर्व,देख ले पहले गाकर.
नाहक नहीं उतार,डायरी में उकताकर.
कह सतीश कविराय,अगर आगे है बढ़ना.
लिखने से भी पूर्व,ज़रूरी समझो पढ़ना.
*सतीश तिवारी 'सरस',नरसिंहपुर (म.प्र.)*

जिसके पहले ही विषम पद के अंत में दो गुरु हैं (ज़रूरी=ISS),जो कि नहीं होने चाहिये-भले ही मात्रा १३ हैं पर नियमानुसार दोष है.

अब देखिये सुधरा रूप,जिसे निर्दोष कुण्डलिया के अन्तर्गत रखा जा सकता है-

*संशोधित रूप*

पढ़ना अति अनिवार्य है,लिखने से भी पूर्व.
कई बार लिखकर मिटा,रचना बने अपूर्व.
रचना बने अपूर्व,देख ले पहले गाकर.
नाहक नहीं उतार,डायरी में उकताकर.
कह सतीश कविराय,अगर आगे है बढ़ना.
लिखने से भी पूर्व,ज़रूरी समझो पढ़ना.
*सतीश तिवारी 'सरस',नरसिंहपुर (म.प्र.)*

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