कुण्डलियाँ

Rajpal Singh Gulia

रचनाकार- Rajpal Singh Gulia

विधा- कुण्डलिया

पैसे बिन संसार में , हुआ नहीं कुछ काम .
मोल लिया है बैर भी , देकर उनको दाम .
देकर उनको दाम , बनाया दुश्मन जानी .
नहीं किसी का दोष, हुई हमसे नादानी .
कह गुलिया कविराय , लोग बहुतेरे ऐसे .
साथ निभाते खूब , मिलें ना जब तक पैसे.
:::::::::::::::
बातें सुन अधिकार की , पूछे इक लाचार .
कब मिलेगा हमें यहाँ , रोटी का अधिकार.
रोटी का अधिकार , रहे ना कोई भूखा .
मिले सभी को कौर , भले हो रूखा सूखा .
कह गुलिया कविराय, हों ऐसी करामातें .
पूर्ण करे भगवान , सभी के मन की बातें .
:::::::::::::::::::
रैली , भाषण , घोषणा , नारे और प्रचार .
मत हथियाने के यही , हैं सारे हथियार .
हैं सारे हथियार , चुनाव में आजमाते .
बातों से ये तोड़ , गगन के तारे लाते .
कह गुलिया कविराय ,देखलो इनकी शैली
जुट जाती है भीड़ , जहाँ ये करते रैली
:::::::::::
रिश्वतखोरी का यहाँ , गरम हुआ बाजार .
झूठ दौड़ता देख लो , लेकर पाँव हजार .
लेकर पाँव हजार , करें रिश्वत की पूजा .
बिन रिश्वत के काम ,सूझे न इनको दूजा .
कह गुलिया कविराय , करें ये सीनाजोरी.
खुश हैं रिश्वतखोर , देखकर रिश्वतखोरी.

Views 6
Sponsored
Author
Rajpal Singh Gulia
Posts 2
Total Views 14
हरियाणा शिक्षा विभाग में अध्यापक
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia