कुण्डलियाँ

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

रचनाकार- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

विधा- कुण्डलिया

अपनी अपनी अहमियत, सूई या तलवार ।
उपयोगी हैं भूख में, केवल रोटी चार ॥
केवल रोटी चार, नहीं खा सकते सोना ।
सूई का कुछ काम, न तलवारों से होना ।
'ठकुरेला' कविराय, सभी की माला जपनी ।
बड़ा हो कि लघुरूप, अहमियत सबकी अपनी ॥

सोना तपता आग में, और निखरता रूप।
कभी न रुकते साहसी, छाया हो या धूप॥
छाया हो या धूप, बहुत सी बाधा आयें।
कभी न बनें अधीर, नहीं मन में घबरायें।
'ठकुरेला' कविराय, दुखों से कैसा रोना।
निखरे सहकर कष्ट, आदमी हो या सोना॥

— त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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त्रिलोक सिंह ठकुरेला
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त्रिलोक सिंह ठकुरेला कुण्डलिया छंद के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं.कुण्डलिया छंद को नये आयाम देने में इनका अप्रतिम योगदान है.

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3 comments
  1. संदेशपरक कुंडलियां रची हैं आदरणीय त्रिलोक सिंह थाकुरेला जी |बहुत बहुत बधाइयाँ |

  2. सोने सी आभा लिए, रचे मनोहर छंद |
    सूझबूझ साहस यही, जीवन का आनंद ||
    जीवन का आनंद, नहीं बस ऊँची बातें,
    लघुतर दिन का काम, करें कब लम्बी रातें,
    माला में यह बात, गूँथने सी पो ने सी,
    खूब रचे कवि छंद, लिए आभा सोने सी ||…….सादर.