कुछ नहीं कर पाएंगे

Dr. Vivek Kumar

रचनाकार- Dr. Vivek Kumar

विधा- कविता

आज,
तोड़े जा रहे हैं पहाड़
अंधाधुंध काटे जा रहे हैं पेड़
किये जा रहे हैं
विज्ञान के नित नए आविष्कार।

धरती के गर्भ को भी
क्षत-विक्षत करने का
जारी है सिलसिला ।

पर अब रोज-रोज के
इन अत्याचारों से
सुगबुगा रही है धरती
बदल रहे हैं मौसम के मिजाज
जल रहा है आसमान
उबल रहे हैं
दोनों ध्रुवों के हिमखंड ।

आएगा एक दिन
जब प्रकृति के कोप
के आगे हम नतमस्तक हो जाएंगे
लाख चाहकर भी
अपने बचाव के लिए
हम कुछ नहीं कर पाएंगे।

डॉ. विवेक कुमार
तेली पाड़ा मार्ग, दुमका, झारखंड।
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

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Dr. Vivek Kumar
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नाम : डॉ0 विवेक कुमार शैक्षणिक योग्यता : एम0 ए0 द्वय हिंदी, अर्थशास्त्र, बी0 एड0 हिंदी, पी-एच0 डी0 हिंदी, पीजीडीआऱडी, एडीसीए, यूजीसी नेट। उपलब्धियाँ : कादम्बिनी, अपूर्व्या, बालहंस, चंपक, गुलशन, काव्य-गंगा, हिंदी विद्यापीठ पत्रिका, जर्जर-कश्ती, खनन भारती, पंजाबी-संस्कृति, विवरण पत्रिका, हिंदुस्तान, प्रभात खबर,राँची एक्सप्रेस, दक्षिण समाचार, मुक्त कथन, वनवासी संदेश, प्रिय प्रभात, आदि पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी केन्द्र, भागलपुर से समय-समय पर रचनाओं का प्रसारण.

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