कुंडलिया-3…. छंद…..दोहा+रोला=कुंडलिया

Radhey shyam Pritam

रचनाकार- Radhey shyam Pritam

विधा- कुण्डलिया

थका पथिक छाया चुने,गरीब माया चुने।
चाह सभी को है लगी,रब सबकी ही सुने।।
रब सबकी ही सुने,मनुज स्मिरण हरपल करो।
पाखंड त्याग हृदय,सच एक आचरण धरो।
सुन प्रीतम की बात,अंधभक्ति तज सच पका।
बहक मत आँख खोल,खुद को न और को थका।
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2-कुंडलिया
प्रकृति जीवन आधारी,सब सुख देती मनुज।
तू छेड इससे करता,होता बडा अचरज।।
होता बडा अचरज,आ बैल मुझे मार तू।
जिसपर बैठा हुआ,काटता वही डार तू।
सुन प्रीतम की बात,स्वच्छ करले मानव स्मृति।
वृक्ष लगा धरा पर,गंद मिटा महके प्रकृति।
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3-कुंडलिया
बढो गुरु वचन हृदयधर,मंजिल साक्षात हो।
गुरु आशीष से पूरी,सोची हर बात हो।।
सोची हर बात हो,जग में मान बढे घना।
ज्ञान ब्रह्मास्त्र यहाँ,करता संकट सामना।
सुन प्रीतम की बात,सदा ऊँचाइयाँ चढो।
सच पथ हौंसले का,वीर धीर चल तुम बढो।
राधेयश्याम बंगालिया "प्रीतम"
कृत कुंडलिया(सर्वाधिकार सुरक्षित)

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