कुंठित शिक्षा !

Satyendra kumar Upadhyay

रचनाकार- Satyendra kumar Upadhyay

विधा- कहानी

मेरी बात मनिएगा जी ! वह कुछ सकुचाया ही था कि तभी वह पुनः बोल पड़ी !! तो उसने अपने माॅ-बाप पर बात टालने की कोशिश की तो वह अडिग हो गयी तो उसे "हाँ" करनी पड़ी ! सुधा थी कि तीन साल बाद गौना के समय पहली रात पुरी तरह व एकमात्र जीवन सहारा "पति, परमेश्वर" से विनती ही कर रही थी और अंततः जिद्द करनी पड़ी । पति ने धीरे से कहा कि "किस बात की हाॅ, करा ली मुझसे" तो सुधा बड़ी सहजता से बोली कि कुछ नहीं जी !
पुनः जिद्द पर उसने बताया कि बचपन में स्वर-साधिका की प्राकृतिक इच्छा पर पर उसकी पूरी पढ़ाई ही बंद कर दी गयी थी सौतेली माँ की ओर से तो वह सिर्फ शिक्षा-ग्रहण करना चाहती है तो उसके पति की आँखें डबडबा आयीं !
और वह धीरे से बोला "सुधा ! तुम्हारी माँ ने मेरी माँ से कहा है कि तुम बेहद शातिर हो"
यह सुन सुधा हँस कम रो ज्यादा रही थी और पति उसे आश्वासन दिए जा रहा था । वहीं सुधा थी अपनी असली माँ को याद किए रोये जा रही थी कि काश ! वह जिंदा होती !
शिक्षा शुरू हुई परन्तु इम्तहान के समय डिलीवरी आ गयी है ।

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Satyendra kumar Upadhyay
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