किस्सा / सांग – # चमन ऋषि – सुकन्या #

लोककवि व लोकगायक पं. राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य @ संकलनकर्ता - सन्दीप कौशिक, लोहारी जाटू, भिवानी - हरियाणा |

रचनाकार- लोककवि व लोकगायक पं. राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य @ संकलनकर्ता - सन्दीप कौशिक, लोहारी जाटू, भिवानी - हरियाणा |

विधा- कविता

किस्सा / सांग – # चमन ऋषि – सुकन्या #

भजन.1

ब्रहमा बैठे फूल कमल पै सोचण लागे मन के म्हां,
आई आवाज समुन्द्र मै तै करो तपस्या बण के म्हा।। टेक।

तप मेरा शरीर तप मेरी बुद्धि तप से अन्न भोग किया करूं,
तप से सोऊं तप से जागू तप से खाया पिया करूं,
तप से प्रसन्न होके दर्शन भगतजनों नै दिया करूं,
मै अलख निरंजन अंतरयामी तप कै सहारै जिया करूं,
तप से परमजोत अराधना तप से बंधू वचन के म्हां।।

तप मेरा रूप तप मेरी भगती तप तै सत अजमाया करूं,
तप मेरा योग तप मेरी माया तप तै खेल खिलाया करूं,
कोए तपै मार मन इन्द्री जीतै जिब टोहे तै पाया करूं,
मै ब्रहमा मै विष्णु तप से मै शिवजी कहलाया करूं,
निराकार साकार तप तै व्यापक जड़ चेतन के म्हा।।

शिश तै स्वर्ग चरण से धरती नाभी से असमान रचूं,
पलक झिमै जिब दिन रात हो आख्यां तै शशि भान रचूं,
तप से क्रोध क्रोध से प्रलय तप तै तीन जिहान रचूं,
तप से मनु देवता निश्चर साधू संत सुजान रचूं,
पीठ से पाप गुदा से मृत्यु जाम्या सोए मरण के म्हां।।

मै नहीं किसे कै धोरै रहता नहीं किसे तै न्यारा सूं,
नहीं किसे तै मेरी ईष्या नहीं किसे का प्यारा सूं,
नहीं किसे नै दुःख सुख देता नहीं किसे का सहारा सूं,
राजेराम कर्म करता फल वैसा देणेहारा सूं,
तप से राज धर्म से लक्ष्मी मुक्ति हरि भजन के म्हां।।

वार्ता:- सज्जनों! जब पाण्डवों को वनवास मिला हुआ था उस समय पांचों पाण्डव और साथ में द्रौपदी रानी लोमश ऋषि के आश्रम में गये। उन्हें देखते ही ऋषिवर ने पूछा- हे राजन् द्रौपदी रानी के साथ वन में
विचरण करते हो। क्या कारण है मुझे बताईये। धर्म पुत्र युधिष्ठिर ने कहा- ऋषिवर! हमारे जैसा इस संसार में दुखी कोई नहीं है। हमारा राज्य कौरवों ने धोखे से जीत लिया। इसलिए वनवासी हुए फिरते है। धर्म पुत्र की बात सुनकर ऋषिवर लोमश ने कहा- हे महारथी पाण्डव नंदन तुम तो कुछ भी दुखी नहीं हो। मै आपको प्राचीन इतिहास सुनाता हॅू। च्यवन ऋषि और सुकन्या का किस्सा सुन। बारह वर्ष की सुकन्या ने अपने बूढे़ पति च्यवन ऋषि को जो अंधा था उसने प्रतिव्रता धर्म से और सतीत्व से जवान बना लिया था। कवि ने फिर लोमश ऋषि की वाणी को कैसे दर्शाते है|

जवाब:- कवि का। रागणी:- 2

पाण्डू गये आश्रम के म्हां ले गैल द्रौपदी राणी नै
लोमश ऋषि बतावण लागे एक प्राचीन कहाणी नै। । टेक।

परमजोत परमेश्वर नै शक्ति से आसमान रचे,
नाभि से कमल, कमल से ब्रह्मा जिसनै सकल जहान रचे,
ग्यारह रूद्र रचे क्रोध से फिर सबके अस्थान रचे,
बामे अंग तै शतरूपा नारी स्वयंभू मनु जवान रचे,
उन दोनों का ब्याह करवाया खुद ब्रह्मा ब्रह्माणी ने।।

बारह सूर्य छप्पन चांद 51 विष्णु विश्वे बीस हुए,
जल वायु से जगत रचाया, जगत पिता जगदीश हुए,
14 मनु 700 इन्द्र कल्प में एक महीश हुए,
सामवेद संगीत कला मै नृत राग छतीस हुए,
तीन ताल सुर सात बताये सरस्वती कल्याणी ने।।

ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि के कश्यप, कश्यप कै तेरह नारी,
तेरहा के मनुज देवता निश्चर किन्नर गंधर्व देह धारी,
कश्यप का बेटा होया सूर्य करदी अगन पवन जारी,
अण्ड पिण्ड उद्भेज जेरण्ड से देई रच दुनिया सारी,
मोह माया से मिथुन सृष्टि रची आग और पाणी नै।।

सूर्य कै बेटा हुआ मनु जिसनै दस अश्वमेघ रचाई थी,
दस पुत्र हुई कन्या ग्यारहवी जो बुध गैला परणाई थी,
दसवां पुत्र शर्याति राजा जिसकै सुकन्या जाई थी,
भृगुवंशी खानदान में वा च्यवन ऋषि के ब्याही थी,
कहै राजेराम कथा महाभारत मैं देख ब्यास की वाणी ने।।

वार्ता:- सज्जनों! अवधपुरी के सूर्यवंशी राजा शर्याति कै पुत्र नहीं था। ब्राहम्णों ने राजा को पुत्रेष्टि यज्ञ करवाने की सलाह दी। राजा, रानियों व सेना सहित वन में जाते है। फिर कवि वहा का वर्णन कैसे करता है|

जवाब – कवि का रागणी:- 3

शर्याति राजा छत्रधारी कुटम्ब कबिला सेना सारी,
यज्ञ हवन की करके तैयारी चाले बियावान मै। । टेक।

भूप थे 14 विद्या ज्ञानी उसकी अवधपुरी रजधानी,
रानी 4 हजार बताई होया फेर भी पुत्र नाहीं,
महारानी कै सुकन्या जाई वा थी उम्र नादान मै ।।

पहुंचगे नदी नर्मदा के तीर, छोड़के अपणी जन्म जांगीर,
उडै़ परम फकीर तपै संन्यासी पण्डित लोग पढ़े हुए काशी,
भूप मंत्री रानी दासी बैठे हर के ध्यान मै।।

उड़ै था च्यवन ऋषि का डेरा, सज्जनों किसे-2 नै बेरा,
चेहरा ऋषि का ना देख्या भाला ढीमक चढ़री मोटा चाला,
आंख चमकती जुगनूं की ढाला जणुं दो तारे आसमान में।।

सुकन्या सब सखियां तै मिली, ऋषि के डेरे में आई चली,
कली राजेराम नै चार जोड़दी, सुकन्या नै कलम तोड़दी,
च्यवन ऋषि की आंख फोड़दी, थी अनजान में।।

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लोककवि व लोकगायक पं. राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य @ संकलनकर्ता - सन्दीप कौशिक, लोहारी जाटू, भिवानी - हरियाणा |
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संकलनकर्ता :- संदीप शर्मा ( जाटू लोहारी, बवानी खेड़ा, भिवानी-हरियाणा ) सम्पर्क न.:- +91-8818000892 / 7096100892 रचनाकार - लोककवि व लोकगायक पंडित राजेराम भारद्वाज संगीताचार्य जो सूर्यकवि श्री पंडित लख्मीचंद जी प्रणाली से शिष्य पंडित मांगेराम जी के शिष्य जो जाटू लोहारी (भिवानी) निवासी है |

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