किस्सा–द्रौपदी स्वयंवर अनुक्रमांक–05

गंधर्व लोक कवि श्री नंदलाल शर्मा

रचनाकार- गंधर्व लोक कवि श्री नंदलाल शर्मा

विधा- कविता

***जय हो श्री कृष्ण भगवान की***
***जय हो श्री नंदलाल जी की***

किस्सा–द्रौपदी स्वयंवर

अनुक्रमांक–05

वार्ता–दुर्योधन के कहने से कर्ण सभा में आ जाता है और मछली की आँख में निशाना लगाने के लिए धनुष पर भाल चढ़ाने लगता है।तभी श्री कृष्ण भगवान का संदेश द्रौपदी तक पहुंचता है और वह कर्ण का अपमान करने के लिए सभा में आ जाती है और कर्ण को बीच में रोककर उससे सवाल जवाब करती है।

टेक–बणकैं बींद आ गया ब्याहवण,बाँध शीश पै सेहरा।
तेरै गाम नाम का पता बता,कुण मात पिता सै तेरा।।

१-मैं तेरा जाणु सूं ठोड़ ठिकाणा,वायस चाहता पायस खाणा,
नित की चाहे चरा दाणा,बणता ना गधा बछेरा।।

२-मैं तनै जाणु सूं बलकारी नै,तूं जन्मा कानिन कुवाँरी नै,
फेर शर्म की मारी नै,तूं ठा पाणी मै गेरा।।

३-मैं तेरी जाणुं सूं बदमाशी नै,कहै ताजा भोजन बासी नै,
पाळ्या राधा दासी नै,यो नया खुदया एक झेरा।।

४-केशोराम अगम का ख्याल,छंद कथैं कुन्दनलाल तत्काल,
नंदलाल ख्याल कर चाल,अड़ै दो दिन का रैन बसेरा।।

दौड़–

दासी के जाम सुण रे गुलाम तेरा काैण काम कण लिया बुला,
तूँ पाजी मन मैं होरह्या राजी खर का ताजि बणता ना,
नामाकुल भूल या तेरी धुळ पड़ो तेरे सिर के म्हां,

जोहरी बच्चा बणकैं बैठ्या भरी छाबड़ी बेरों की,
देख लाल की किमत होती हो ना कद्र लुटेरों की,
लगै झपटी जब बाज की जागी जान बटेरों की,
हाय हिजड़ा मोड़ बाँध कैं मन मैं कर रह्या फेरों की,

जब तुरंग तहनाळ जड़ाते मेंढक भी कई पैर उठाते,
वै बैशर्म ना शरमाते झट ऊपर नैं करलें पां,

जौहरी बच्चा बणकैं बैठ्या,पिता करी ना चरवेदारी,
तूं चाहता सरदारी भारी,कौण पिता और महतारी पहले उनका नाम बता,

रै किसनै भेजी पाती कुण सै तेरा हिमाती,
मेरी क्युं फूँकै सै छाती,देख देख कैं होगे घा,

फेर द्रौपदी कहण लगी थी सब राजों को सुणा सुणा,
कोय राजपूत का लड़का उठो धनुष बाण ल्यो कर मै ठा,
मीन नै तार कै तळै गिरा दयो उसनै मै ल्यूंगी प्रणा,

हाथ जोड़ फेर द्रौपदी करण लागी अस्तुति,
छत्रापण का अन्त आ लिया डूबो दई रजपूती,
कर्ण नाम ब्याहवण का ले तो तेरै गिण गिण मारूं जूती,

सौ मारूंगी एक गिणुँगी तनै पहल तैं रही बता,
तूं भगज्या भगज्या जल्दी भगज्या,
आँख्या देख्या नहीं रह्या सुहा,

कर्णवीर नै मुश्किल होगी नहीं अगाड़ी टिकरे पा,
पाट पाट ऐ धरण पाटज्या मैं तेरै मै जाऊं समा,
हे भगवान पंख भी कोनी आसमान मै चढ्या ना जा,
ऐसे ऐसे दुख देखण नै क्युँ जन्मै थी हे मेरी माँ,

दासी का सुत कह्या कर्ण को सबनै मालम पाट लई,
कर्णवीर नै मुश्किल होगी तबीयत अपणी डाट लई,
भूप कहैं थे लड़की नै भाई मूछ कर्ण की काट लई,

कर्णवीर नै मुश्किल होगी नहीं अगाड़ी टिकते पा,
दुर्योधन कै धोरै जा कै सब राजों को रह्या सुणा,
कहते कुन्दनलाल हाल संकट के म्हां करो सहा।

कवि: श्री नंदलाल शर्मा जी
टाइपकर्ता: दीपक शर्मा
मार्गदर्शन कर्ता: गुरु जी श्री श्यामसुंदर शर्मा (पहाड़ी)

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