किस्सा–द्रौपदी स्वयंवर अनुक्रमांक–04(ख)

गंधर्व लोक कवि श्री नंदलाल शर्मा

रचनाकार- गंधर्व लोक कवि श्री नंदलाल शर्मा

विधा- कविता

***जय हो श्री कृष्ण भगवान की***
***जय हो श्री नंदलाल जी की***

किस्सा–द्रौपदी स्वयंवर

अनुक्रमांक–04(ख)

टेक–विष देदे विश्वास नहीं दे धोखा करणा बात बुरी सै।
चौड़े मै मरवा दे लोगो कपटी की मुलाकात बुरी सै।।

१-वीरों के दिल हिल सकते ना,पुष्प झड़े हुए खिल सकते ना,
चकवा चकवी मिल सकते ना,उनके हक मैं रात बुरी सै।

2-बरखा बरसै लगै चौमासा,चातक नै स्वाति की आशा,
बढ़ै घास और जळै जवासा,उसके लिए बरसात बुरी सै!

३-पापी पीपळ बड़ नै काटै,दया धर्म की लड़ नै काटै,
प्यारा बण के जड़ नै काटै,मित्र के संग घात बुरी सै

४-दिल खुश हो सुण प्रिये वाणी को,मुर्ख समझै ना लाभ हाणी को,
हंस अलग करै पय पाणी को,काग कुटिल की जात बुरी सै

५-सतपुरुषों कै भ्रम नहीं हो,बे शर्मों कै शर्म नहीं हो,
जहाँ इंसाफ व धर्म नहीं हो,नंदलाल कहै पंचयात बुरी सै।

कवि: श्री नंदलाल शर्मा जी
टाइपकर्ता: दीपक शर्मा
मार्गदर्शन कर्ता: गुरु जी श्री श्यामसुंदर शर्मा (पहाड़ी)

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