किस्सा–चंद्रहास अनुक्रम–5

गंधर्व लोक कवि श्री नंदलाल शर्मा

रचनाकार- गंधर्व लोक कवि श्री नंदलाल शर्मा

विधा- कविता

**नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ**

***जय हो श्री कृष्ण भगवान की***
***जय हो श्री नंदलाल जी की***

किस्सा–चंद्रहास

अनुक्रम–5

वार्ता–धाय माता के स्वर्गवास के पश्चात लड़का चंद्रहास करूणा विलाप करता है और कहता है–

टेक–के रसना रूकगी बोल्या ना जाता री,
तेरा याणा कँवर करै माता माता री।

१-के बुरी बणी,बिन मणी फणी सिर फोड़ै,रही सता,बता के खता,कँवर कर जोड़ै,
क्युं तोड़ै सै बचपन का नाता री।

२-रह्या हर हर कर,ज्युँ पर कटने से पक्षी,छुट्या ज्ञान ध्यान, अब जान नहीं जा बक्षी,ये मक्षी लिपटैं टूट रह्या छाता री।

३-दिल धड़कै भड़कै फड़कै,पलपल मैं उर,जळया भाग मंद, पड़्या फंद बंद होगे सूर,जुर चढ़्या असाध,शरीर जळै ताता री।

४-के कहुं और ना जोर,मोर से बोलैं,मिथुन राश दश,हँस हँस रस सा घोलैं,री बता कद खोलैं,नंदलाल बही खाता री।

कवि: श्री नंदलाल शर्मा जी
टाइपकर्ता: दीपक शर्मा
मार्गदर्शन कर्ता: गुरु जी श्री श्यामसुंदर शर्मा (पहाड़ी)

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