किस्सा–चंद्रहास अनुक्रम–10

गंधर्व लोक कवि श्री नंदलाल शर्मा

रचनाकार- गंधर्व लोक कवि श्री नंदलाल शर्मा

विधा- कविता

***जय हो श्री कृष्ण भगवान की***
***जय हो श्री नंदलाल जी***

किस्सा–चंद्रहास

अनुक्रम–10

वार्ता– लड़के की भगवान के प्रति श्रद्धा को देखकर जल्लादों का मन बदल जाता है।वो सोचते हैं कि राजा को कोई निशानी तो देनी पड़ेगी तो वो लड़के चंद्रहास की पैर की छठी उँगली काट लेते हैं।चंद्रहास को अंग वृद्धि का दोष था जो उसके भाग्य पर भारी पड़ रहा था।
उँगली कटने के बाद लड़का तड़प रहा था तो भगवान की कृपा होती है जंगल के सभी पशु पक्षी उसकी सेवा में लग जाते हैं।

उधर से चंदनावती का राजा कुलिंद शिकार खेलने के लिए आता है।वह लड़के से परिचय पुछता है तो लड़का उसको अपना परिचय से पहले कहता है…..

दोहा–चंद्रहास कहणे लगा मेरा नहीं नाम और गाम,
तूं रस्ता अपना ले लिए बता मेरे से क्या काम।

टेक–कौण सुणै कहूँ किसकै आगै दर्द कहानी मेरे मन की बात।

१-पता ना कुणसा करया था पाप,जी नै तो होरया घणा संताप,
याणे से का बाप मरया ,गैल सती वा हो गई मेरी मात।

२-के कहुं अन्याय हो रह्या सै,जी लिकड़न का राह हो रह्या सै,
देख लियो मेरै घा हो रह्या सै,मारया दर्द का चस चस करै गात।

३-एक धाय माता मनै पाळया करती,दिन और रात रूखाळया करती,
मिनट मिनट मै संभाळया करती,माटी मै माटी मिलगी होगी खात।

४-तन पै विपदा ठाणी पड़गी,आज मनै या बताणी पड़गी,
दर दर की मनै खाणी पड़गी, ठोकर कोय कोय मारै लात।

दौड़–

मेरा नहीं नाम और नहीं गाम तेरा कोण काम तूं कहरह्या क्या,
मैं आसमान नै पटक्या झटक्या धरती नै झेल्या कोन्या,

यो सारा जग सुख से बस्ता,मैं धेलै तै भी सस्ता,
तूं लेले अपना रस्ता,क्यूँ दुखिया नै रह्या सता,

कौण सै रै कौण सै तूं बोल मारणीया,दुखियारे के साथ मै मखौल मारणीया,
मेरा होग्या जख्म हरया,मैं जीया ना मरया,तनै खुड़का भी ना करया,इसा पिस्तौल मारणीया,
मेरी लई आंगळी काट,मेरै लेखै मिलगे पाट,तेरे झूठे बट्टी बाट,कमती तौल मारणीया,
मेरै पास नहीं धन माया,क्युं दुखिया जीव सताया,तनै पाणी भी ना प्याया,रीते डौल मारणीया,मरूं सूं तिसाया गारा घोळ मारणीया।

अपणै रस्तै जाइये तूं दूर खड़्या बतलाईये,मतन्या आईये मेरै पा,
घणी कहुं के ज्यादा,ना ओर कहण मै फायदा,के सै तेरा इरादा,मनै तावळ करके दिए बता।

राजा सुणकैं कहण लाग्या,लड़के धौरै आया,मुख धोया था लड़के का,लड़के को नीर पिलाया,बहोत घणा नामा मनै कुल के अंदर लाया,
परमेश्वर नाराज होया ना राणी कै सुत जाया,आज मेरै पै मेहर करी मनै पाळया पोष्या पाया।

ले लड़के नै चाल पड़या,घोड़े पै होया अश्वार,देर नहीं करी भूप नै नगरी मै आया पधार,घोड़े को बंधाया था तार धरे थे हथियार।

चंद्रहास को संग मै ले वो राणी कै धोरै जा,धोरै जा के राणी को मुख से वाणी कह सुणा,ले लेले लड़का मिटज्या धड़का गड़बड़ का कोय काम ना,

समझदार नार थी राणी,मुख से वाणी कही सुणा,
बालम तुमको कोन्या मालम,जालम कितना जुल्म करया,किस दुखियारी का ल्याया सै वा रो रो मरज्या रुदन मचा,

समझदार माणस पास जावै नहीं राड़ के,दूसरे का काम कदे राजी ना बिगाड़ के,किस तरीया जीवै जिसनै जाम्या पेट पाड़ के,

माँ नै बेटा प्यारा हो वा रो रो के नै मर लेगी,तावळ करके ले ज्या साजन वा सबर किस तरीया कर लेगी,

राजा जब कहण लगया मै नहीं खोस कै लाया,बियाबान जंगल के अंदर मुझको लड़का पाया,
परमेश्वर नै म्हारे ऊपर कर दी सै छाया,
वा इतणी सुण कै राजी होगी लड़का झट छाती कै लाया,
सही समय पै चंद्रहास को पढ़ण नै बिठाया,पढ़ा लिखा तैयार करया फेर पंडित को बुलाया,शुभ मुहूर्त फेर राजा नै दिखाया,

पंडित को बुलाया चंद्रहास को दिया था राज,राजपाट का मालिक होग्या शीश पै टिकाया ताज,हो रह्या गाणा बजाणा बाज रहे सुरीले साज,तन मन धन से सेवा करूँ दादा गुरु बेगराज।

५-सरवर सुना झाल बिना,गाणा सुना सुर ताल बिना,
नंदलाल बिना कुण राखण आळा, बेगराज थारे सिर पै हाथ।

कवि: श्री बेगराज शर्मा शिष्य श्री नंदलाल शर्मा जी पात्थरवाली
टाइपकर्ता: दीपक शर्मा
मार्गदर्शन कर्ता: गुरु जी श्री श्यामसुंदर शर्मा (पहाड़ी)

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