कान दीवारों के होते हैं

Pritam Rathaur

रचनाकार- Pritam Rathaur

विधा- गज़ल/गीतिका

बीज वफ़ा के तू बोया कर
देख ग़मों को मत रोया कर

बहुत अहम हैं माँ की दुआएं
उनकी खातिर भी सोचा कर

ग़र खुशियों को जो तू चाहे
दिल औरों से भी जोड़ा कर

मुरझाएँगें पल मे सारे
शाख़ गु़लों के मत तोड़ा कर

हाथ न तेरे ये जल जाएँ
अंगारों से मत खेला कर

आँख उठा कर देख ले हमको
इश्क़ तुम्ही से है समझा कर

बचपन की ग़लती दुहरा कर
याद पुरानी फिर ताजा कर

तड़प रहे हैं कब से "प्रीतम"
रहम तू हम पर भी खाया कर

गिरह–
कान दिवारों के होते हैं
धीरे——धीरे बोला कर

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Pritam Rathaur
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मैं रामस्वरूप राठौर "प्रीतम" S/o श्री हरीराम निवासी मो०- तिलकनगर पो०- भिनगा जनपद-श्रावस्ती। गीत कविता ग़ज़ल आदि का लेखक । मुख्य कार्य :- Direction, management & Princpalship of जय गुरूदेव आरती विद्या मन्दिर रेहली । मानव धर्म सर्वोच्च धर्म है मानवता की सेवा सबसे बड़ी सेवा है। सर्वोच्च पूजा जीवों से प्रेम करना ।

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