कान्हा-व्यथा

Rajeev 'Prakhar'

रचनाकार- Rajeev 'Prakhar'

विधा- कविता

कान्हा बोले यूँ मैया से,
"क्यूँ कलियुग में जाऊँ मैं l
जो माखन अब नहीं है असली,
काहे भोग लगाऊँ मैं"?
कान्हा बोले यूँ मैया से …l

"गऊ माता लाचार बेचारी,
खून के आँसू रोती है l
थनों में उसके, दूध की आमद,
इन्जेक्शन से होती है l
मुन्नी व शीला के युग में,
मुरली किसे सुनाऊँ मैं ?
जो माखन अब नहीं है असली,
काहे भोग लगाऊँ मैं" ?
कान्हा बोले यूँ मैया से …l

"द्वापर में तो नाग कालिया,
साफ़-साफ़ दिख जाता था l
इसीलिए तो मैंने उसको,
आसानी से नाथा था l
अब नागों ने बदले चोले,
कैसे उन तक जाऊँ मैं ?
जो माखन अब नहीं है असली,
काहे भोग लगाऊँ मैं"?
कान्हा बोले यूँ मैया से …l

"मामा कंस ने मारी कन्या,
दुनियां वाले कहते हैं l
आज देश में और भी मामा,
ऊँचे-ऊँचे रहते हैं l
मामी को भी कम न संमझो,
सबका नाच दिखाऊँ मैं l
जो माखन अब नहीं है असली,
काहे भोग लगाऊँ मैं"?
कान्हा बोले यूँ मैया से …l

"बदल चुकी हैं आज गोपियाँ,
इक-दूजे से जलती हैं l
तब शर्म ओढ़कर चलती थीं,
अब शर्म छोड़कर चलती हैं l
तन पे शर्म-हया का टोटा,
अब क्या वस्त्र चुराऊँ मैं l
जो माखन अब नहीं है असली,
काहे भोग लगाऊँ मैं"?
कान्हा बोले यूँ मैया से…l

(सर्वाधिकार सुरक्षित)

– राजीव 'प्रखर'
मुरादाबाद (उ. प्र.)
मो. 8941912642

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