**** कहानी माँ की ****

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- कविता

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माँ तो केवल माँ होती है
कभी धूप तो कभी छाँव
कभी कठोर तो कभी नम
खुद तपती धूप को सहकर
हमें आँचल में छुपाती है
आप गीले में सोकर हमें
शीत कहर से बचाती है
खुद जिंदगी का जहर पीके
हमे अपना अमृत पिलाती है
पता नहीं माँ खुद मरमर के
हमें कैसे जिलाती है ।
हम भूल जाते हैं जब खुद
अपने कदमों पे चलते हैं
कलेजा माँ का जलता
हम चैन से सोते है ।
कभी लिपटे रहते थे
माँ के आँचल से ….आज
बीबी के आगोश में सोते हैं
बांटते है माँ की ममता को
खुद गैर होकर रहते हैं ।
ज़रा याद करलो उसको जो
कभी मैला धोती थी तुम्हारा
बस इतनी थी माँ की……..
पुरानी कहानी …….
अब सुनों …आधुनिक माँ
की कहानी……मेरी जुबानी
आजकल माँ बनना फैशन
बन गया लगता है क्योंकि
विवाह होते ही दुल्हन को
टेंशन होने लगती है कहीं
मै जल्दी माँ न बन जाऊं
इसी फेर में जाने अनजाने
वो कितनी ……अजन्मी
हत्याऐं कर देती है धीरे-2
अभ्यस्त होती जाती है
ममता मरी जाती है और
वो जन्म देने के बाद भी
माँ नहीं बन पाती है…
…………इसीलिए
दस दिन पहले जन्मे बच्चे
को तपती धूप में with money
सड़क पर अकेला छोड़ जाती है
और उम्मीद करती है किसी ओर
से कि किसी की ममता जगे और
वह उसे अपने घर की रौनक बना
लें ।।..क्या यह सम्भव है ? …
** ,👍मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

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