कस्तुरी

Neelam Naveen

रचनाकार- Neelam Naveen "Neel"

विधा- कविता

इस अक्षांश में जैसे
मुझे मेरे अंदर की
कस्तुरी से विमुक्त कर
मेरे मन का शोर
मौन को तोड़ता रहा
बारम्बार उन्मुक्त हो ।
जाने कितनी दफा मैं
ऐसे ही अंदर सफेद हो
बस पिघलता रहा कहीं
इस अनवरत विहंगम में
और तलाश लिए मैंने
सोये शब्द,खोये सपने ।
जो स्पन्दन से है कहीं
अन्जान तथाकथित वो
बादलों सा अस्तित्व लिये
मुझमें है भी, और नही भी
किन्तु मायने नही,कि वो हो
अब कस्तुरी विलुप्त ही सही।।

नीलम "नील"
देहरादून

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Neelam Naveen
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