कवी मंच वालो

guru saxena

रचनाकार- guru saxena

विधा- कविता

व्यंग्य विनोद

कवी मंच वालो कवी मंच वालो
यहां मैं जमाऊं वहां तुम जमालो
मदारी के लटके सभी एक जैसे
ये बातों के झटके सभी एक जैसे
वतन प्रेम फटके सभी एक जैसे
कवयित्री से सटके सभी एक जैसे
बचा क्या अभी तक जो कविता बचा लो
कवी मंच वालों कवी मंच वालो।।

तुम्हें पढ़ने लिखने की फुर्सत कहां है
विचारों में सिकने की फुर्सत कहां है
सयानो में टिकने की फुर्सत कहां है
निराला से दिखने की फुर्सत कहां है
यहां का वहां का सभी का सुना लो
कवी मंच वालो कवी मंच वालो।।

नहीं ज्ञान रस का है पेमेंट बढ़िया
नहीं छंद बस का है पेमेंट बढ़िया
अलंकार मस्का है पेमेंट बढ़िया
सभी दूर ठसका है पेमेंट बढ़िया
तुझे मैं बुलाऊं मुझे तुम बुला लो
कवी मंच वालों कवी मंच वालो।।

किशोरों जवानों की धड़कन में धड़को
खुले सेक्स गानों की धड़कन में धड़को
मेरा दिल यहां है तेरा दिल वहां है
सभी जानते दिल धड़कता कहां है
किशोरी किशोरो युवा वर्ग लड़को
जहां मौका पाओ वहां जाके धड़को
मजे मारना है तो मजमा जमालो
कवी मंच वालो कवी मंच वालो।।

कलम के सिपाही अगर सो गए तो
सभी ऐसी सुविधाओं में खो गये तो
ये नेता नई कोंपलें खोंट लेंगे
घुटालों में पूरा वतन घोंट देंगे
कलम को उठा लो दुनाली बना लो
कवी मंच वालो कवी मंच वालो।।

अनुरोध:- महाकवियों से निवेदन है कि यथा स्थान गुरू को लघु और लघु को गुरू मानकर पढ़ें। छंद जांचने का प्रयास न करें।

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