कविता : स्वदेशी

Radhey shyam Pritam

रचनाकार- Radhey shyam Pritam

विधा- कविता

स्वदेशी अपनाओ अगर विदेशी से अच्छा है।
संज्ञा नहीं कार्य ही स्वेच्छा की एक सुरक्षा है।
पहले तोलो फिर बोलो नीति कितनी सही है।
दूध से मिठाइयाँ,लस्सी और बनती दही हैं।
सही का दम भरो गलत को तुम खत्म करो।
आनंदमग्न रहो अपनी खुशी में न मातम करो।
जलवा ऐसा हो जिसे दुनिया में सलाम भरो।
नेकियाँ तुम करते चलो,कारवां बस बनता रहे।
सामने जो आए साथी तुम्हारा एक बनता रहे।
स्वदेशी का नारा तन-मन में समा जाए ऐसा।
शरीर में प्राणों का सिलसिला हो भाई जैसा।
कायनात में अपना एक नाम तो होना चाहिए।
देशप्रेम का बीज हर जन में देखो बौना चाहिए।
करतब ऐसे करो कि एक अफसाना बने बंधु।
जो देखे सुने वो तुम्हारा दीवाना एक बने बंधु।
सूर्य-चन्द्र की तरह,झूमें हम समंदर की तरह।
अपनेपन का अहसास हो बस नीलंबर की तरह।
पूरे हों अरमां सभी के यही एक दुवा करते हैं।
स्वदेशी अपनाओ आप पर एक निगाह करते हैं।
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👌👌 राधेयश्याम प्रीतम👌👌

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