कविता भी बनी प्रोडक्ट है

अजय कुमार मिश्र

रचनाकार- अजय कुमार मिश्र

विधा- कविता

अजब है दुनिया
यहाँ चलती का नाम ही गाड़ी है,
चलते-चलते ठहर गया जो
वो तो राहों का अनाड़ी है।
अब तो ये दुनिया
बनी ही बाज़ार है
आकर्षित आवरण युक्त सामग्री
की ही दुनिया क़द्रदार है।
चकाचौंध विज्ञापनों से
जो उत्पाद ही परोसता
वो ही उत्पादक तो
ग्राहकों को ही खिंचता।
इस बाज़ारी दुनिया में
कविता भी बनी प्रोडक्ट है,
सस्ते भावों से ही
श्रोताओं को करती ऐडिक्ट है।
सस्ती कविता ही
जब बिक जाए,
तो कवि गहन जगाने में
क्यूँ व्यर्थ ही समय गँवाए।
मंचों से बोल गया
वही कवियों में शुमार है,
सरस्वती साधक कवि
अब कहाँ असरदार है।
पर सरस्वती साधक कवि
न मोह जाल में पड़ता है,
अपने असंतुष्ट भाव संजोकर
कलम को तलवार करता है।
सस्ते कवि चन्द छंद गाकर
ही लुप्त हो जाते हैं,
सरस्वती साधक कवि,
इतिहास ही रच जाते हैं।

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अजय कुमार मिश्र
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रचना क्षेत्र में मेरा पदार्पण अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को निखारने के उद्देश्य से हुआ। लेकिन एक लेखक का जुड़ाव जब तक पाठकों से नहीं होगा , तब तक रचना अर्थवान नहीं हो सकती।यहीं से मेरा रचना क्रम स्वयं से संवाद से परिवर्तित होकर सामाजिक संवाद का रूप धारण कर लिया है। कविता , शेर , ग़ज़ल , कहानियाँ , लेख लिखता रहा हूँ।

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