कब आओगे

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

रचनाकार- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

विधा- कविता

अनगिनत दुःशासन
चीरहरण करते
वसुधा का,
आँचल
रोज
सिमटता जाता,
मधुसूदन, तुम कब आओगे ?

कालियदह
हर घाट बन गया
भारत की
सारी नदियों का,
पग-पग पर
विषधर-समूह
जीवन-सरिता में
जहर मिलाता,
मधुसूदन, तुम कब आओगे ?

वंशज कई
पूतना के
सक्रिय हो गए,
पय की
बूँद-बूँद में
मौत घोलते
हाय, विधाता !
मधुसूदन, तुम कब आओगे ?

खण्ड खण्ड
पर्वत-मालाएं
हे गिरिधर !
दिन-रात हो रहीं,
वायुमण्डल
घुटन भरा
मन को अकुलाता,
मधुसूदन, तुम कब आओगे ?

Sponsored
Views 10
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
त्रिलोक सिंह ठकुरेला
Posts 10
Total Views 364
त्रिलोक सिंह ठकुरेला कुण्डलिया छंद के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं.कुण्डलिया छंद को नये आयाम देने में इनका अप्रतिम योगदान है.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia