कब्रिस्तान न बन जाएं

प्रदीप कुमार गौतम

रचनाकार- प्रदीप कुमार गौतम

विधा- कविता

मानवीय संवेदनाओं का
मानव से ह्रास हो रहा है
लूट का तांडव
मजहब का बवंडर
दर-दर भटकती मानवता
सुन रहा हूँ
हर दिन की चीख पुकार
महिला को बोलता
कोई विक्षिप्त
किन्तु
उससे अधिक तो
जिसने बीच
चौराहे में
मारे उसे डंडे
बुलवाया
अल्लाह
जय श्री राम
जय हनुमान
दूषित मानसिकता का
दिया परिचय
खुद ही है विक्षिप्त

प्रेमी को पकड़ा
मजहब के ठेकेदारों ने
उखाड़ लिए नाखून
नोच डाले बाल
कर दिया विक्षिप्त

सास ने
जो खुद
एक स्त्री है
बहु को मारा
ससुर के साथ
फाड़ डाले कपड़े
कर दिया नंगा
झकझोर डाला
उसके स्त्रीत्व को

बेरहम दुनिया नही
मानव है
जो खुद गुणों को
भुलाकर
बन गया बहशी
तभी तो
हर रोज
जिंदा माँस में
नोची जाती हैं
औरतें
घूरा जाता है
छेड़ा जाता है
माल माल कहकर
पुकारा जाता है ।

हर निगाहे तभी तो
भूखे सियार की तरह
ताकती है ।
सोचता हूँ सदियों पुराना
संस्कृति, सभ्यताओं का देश
कहीं कब्रिस्तान न बन जाए ।
—————————
प्रदीप कुमार गौतम
शोधार्थी, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी

Views 24
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
प्रदीप कुमार गौतम
Posts 3
Total Views 51
शोधार्थी, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी(उ0प्र0) साहित्य पशुता को दूर कर मनुष्य में मानवीय संवेदनाओ का संचय करता है एवं मानवीय संवेदनाओ के प्रकट होने से समाज का कल्याण संभव हो जाता है । इसलिए मैं केवल समाज के कल्याण के लिए साहित्यिक हिस्सा बनकर एक मात्र पहल कर रहा हूँ ।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia