** कचड़ा **

पं.संजीव शुक्ल

रचनाकार- पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

विधा- कविता

फेक कर कचड़े की थैली
सड़क बर्बाद करते हो
धरोहर राष्ट्र के हो तुम
नाम बदनाम करते हो।
कभी सरकार को कोसो
कभी मंत्री को दो गाली
चुनावी मौसम जब आता
पौवे की मांग करते हो।
तुम्हें न राष्ट्र की चिंता
चीता सम शक्ल है तेरा
अक्ल से अंधे दिखते हो
वक्त बर्बाद करते हो।
भला हो राष्ट्र का जिससे
कहाँ वो काम करते हो
भलाई जिससे हो तेरा
वहीं तुम मांग करते हो।
नमन है उन सहिदों को
हुये जो राष्ट्र पे कुर्बान
वहीं तुम कार्य उल्टे कर
उन्हें शर्मसार करते हो।।
©®पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

Views 1
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
पं.संजीव शुक्ल
Posts 71
Total Views 511
मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia