** ओ मृग नयनी **

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- गीत

ओ मृगनयनी
तेरी आँखों को मैं क्या कहूं ओ मृग नयनी
सागर सा है हिया तेरा उसमें है खारा पानी
ओ मृगनयनी
सागर सी गहराई लिए खंजन सी आँखे हैं तेरी
आँखों के अंजन में छुपा रखा है कौन सा राज
ओ मृगनयनी
समन्दर है कौन सा दिल में तेरे दिलबर जानी
मैंने जब देखा था तुझको सूरत लगी पहचानी
ओ मृगनयनी -2
आँखों में तेरे कौन सा सागर बसा है जो
दिनरात तेरी आँखों में भरा रहता है पानी
ओ मृगनयनी -2
जब तेरी मेरी पहली मुलाक़ात हुई तो मैंने पूछा
आँखों में काजल है या है अंखियां कजरारी
ओ मृगनयनी -2
आज भी तुझको सागर किनारे दिल ये पुकारे
तूं जो नहीं तो मेरा कोई नही है सागर किनारे
ओ मृगनयनी ओ मृगनयनी
👍मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

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