* ऐसा क्यूं होता है ?

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- गीत

जाने ऐसा क्यूं होता है ?
जब मैं अपने से जुदा होता हूं
तन्हा-तन्हा मैं क्यूं होता हूं ?
जाने ऐसा क्यूं होता है ?
जब मैं अपनों से जुदा होता हूं ।
एक अजनबी सा डर लगता है
जब मैं अपनों से जुदा होता हूं ।
मेरे अपने नहीं लगते अपने
जब मैं अपनो को
बेगाना-सा लगता हूं ।
ऐसा क्यूं होता है ?
मेरी तन्हाई ओर की तन्हाई में
फर्क इतना सा मगर होता है ।
लोग तन्हाई में अकेले होते हैं
मैं महफ़िल में अकेला होता हूं
जाने ऐसा क्यूं होता है ?
दर्द बढ़ता है दर्दे दुआ करने से
फिर दर्दे-दवा की परवाह क्यूं है
जाने ऐसा क्यूं होता है ?
मैं करता हूं मुहब्बत जिससे वो
क्यूं नफ़रत करता है मुझसे ?
जाने ऐसा क्यूं होता है ?
जाम-ए-महफ़िल में होके शामिल
मैं बेनशा क्यूं होता हूं ?
जाने ऐसा क्यूं होता है ?
जब मैं अपने से जुड़ा होता हूं
तन्हा-तन्हा मैं क्यूं होता हूं ?
जाने ऐसा क्यूं होता है ?
👍मधुप बैरागी

Sponsored
Views 9
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
भूरचन्द जयपाल
Posts 383
Total Views 9.6k
मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia