ए मन मेरा हुआ चंचल

संजय सिंह

रचनाकार- संजय सिंह "सलिल"

विधा- गज़ल/गीतिका

ए मन मेरा हुआ चंचल न जाने क्यों बहकता है l
मेरे घर के रहा जो सामने छत पर टहलता है ll

समा है चांदनी रातों का उसपर मेघ काले हैं l
हवाएं चल रही हैं जोर पल्लू भी सकता है ll

नहीं उसको पता कुछ भी मेरी अपनी जो हालत है l
मेरा मन मोर है व्याकुल यह मौसम भी समझता है ll

हवा का साथ ना देना लटों का पीछे ही रहना l
कदम तो आगे बढ़ते हैं लगे मन पीछे रहता है ll

रहा जो दिल में ही अपने उसे अब ढूंढना कैसा l
करूं मैं बंद जब आंखें वो मेरे दिल में रहता है ll

नहीं भूला अभी तक तिरछी नजरों देखना उसका l
हुई मुद्दत गए उसको "सलिल"अब तक महकता है ll

संजय सिंह "सलिल"
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश l

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संजय सिंह
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मैं ,स्थान प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश मे, सिविल इंजीनियर हूं, लिखना मेरा शौक है l गजल,दोहा,सोरठा, कुंडलिया, कविता, मुक्तक इत्यादि विधा मे रचनाएं लिख रहा हूं l सितंबर 2016 से सोशल मीडिया पर हूं I मंच पर काव्य पाठ तथा मंच संचालन का शौक है l email-- sanjay6966@gmail.com, whatsapp +917800366532

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