एक ग़ज़ल “बह्र-ए-जमील” पर

Rohitashwa Mishra

रचनाकार- Rohitashwa Mishra

विधा- गज़ल/गीतिका

इक अजनबी दिल चुरा रहा था।
करीब मुझ को' बुला रहा था।

वो' कह रहा था बुझाए'गा शम्स,
मगर दिये भी जला रहा था।

वो' ज़ख़्म दिल के छुपा के दिल में,
न जाने' क्यों मुस्करा रहा था।

वो सबक़-ए-उल्फत हम ही से पढ़कर,
हमें मुहब्बत सिखा रहा था।

बुरा है' टाइम तो' चुप है' "रोहित"।
नहीं तो' ये आईना रहा था।

©रोहिताश्व मिश्रा

Views 3
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Rohitashwa Mishra
Posts 1
Total Views 3
"रोहित" फ़र्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश)

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia