एक लाल तो देदे माता

तिलक राज शाक्य

रचनाकार- तिलक राज शाक्य

विधा- कविता

🇮🇳 एक लाल तो दे दे माता 🇮🇳

सफेद कबूतर उड़ाए थे जो हमने
शांति की तलाश में
बाज ने झपट नोंच लिए वो
बीच आसमान में

गुब्बारे छोड़े थे जो हमने
अमन का सन्देश देकर
नफरत की तपिश से फूट गए वो
बीच आसमान में

अगर शांति चाहिए तो
खुले नुकीले पंखों वाले
स्लेटी रंग के जहाजी कबूतर
उड़ाने होंगे अब आसमान में

अमन का सन्देश देना है तो
पीतल की परत वाले गोल गुब्बारे
हवा नहीं इनमें कुछ ठोस भरो
फटे तो सुन सकें बहरे भी
जब गूंजे आसमान में

बहुत हो चुका स्वाँग रुठने-मनाने का
मान-मनोव्वल छोड़ो
अब असल रूप में आ जाओ
दूसरा नहीं समझे जब
क्या रखा है ऐसे मान में

समयबद्ध,लक्ष्यभेदक,अग्निबाण अब संभाल लो
दिखा दो दुश्मन को क्या होता है
जब आता है अपना तीर-कमान में

रेलगाड़ी और बसों को चलाना छोड़ो अब
चलाना हो तो कुछ ऐसा चलाओ
बेरोक चढ़े जो खन्दक या पहाड़ हो
दुश्मन की आँख ना खुल सके
धूल ऐसी उड़े मैदान में

ये कैसा चलन आ गया देखो मेर देश में
बेऔलादी की शर्म से बचने को
अपने लिए पैदा करके लाडला
तौबा कर लेते हैं,बस एक संतान में

शहज़ादे हमारे घर पैदा हों
और शहीद दूसरों की कोख से
कितना नीचे गिर चुके हैं हम
झांक कर देखो ज़रा अपने गिरेबान में

एक लाल पैदा किया और
अंग्रेजी स्कूल ढूंढने लगे
दूसरा बच्चा करना क्या
यूँ कहकर आधुनिक बनने लगे
एक देश के लिए भी पैदा कर दो
क्या कमी आ जायेगी तुम्हारी शान में

एक पैदा कर इंजीनियर बना,विदेश भेज दिया
वो विदेशों की खूबियां बढ़ाए
और फिर हम लग जाते हैं
अपने देश की कमियां गिनाने के काम में

बहुत हो गया अब तो समझो
एक लाल तो देश को दे दो
शीश काट कर ले गया दुश्मन
सीमा पर धड़ पड़ा पुकारे,वीर जवान का
क्या कमी रह गई थी हमारे बलिदान में

सीमा पर धड़ पड़ा पुकारे
क्या अब पैदा नहीं होती भारत में
पन्ना धाय सी जननी
जिसने आहुति दी अपने पुत्र की
अपने राजवंश के बचाव में
और क्या अब नहीं कोई माँ कुन्ती जैसी
भीम को खुद भेजा था जिसने
दुष्ट बकासुर के संधान में

सीमा पर धड़ पड़ा पुकारे वीर जवान का
किसकी कोख से जन्म लेगा वो
कुरुक्षेत्र के इस देश में
सुखदेव,भगत सिंह के वेश में
चार चाँद लगा दे जो फिर से
भारत के स्वाभिमान में
एक लाल तो दे दे माता
देश हित बलिदान में

🌻तिलक राज शाक्य (अम्बाला )🌻

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