एक रात की बात

Archna Goyal

रचनाकार- Archna Goyal

विधा- कविता

बात बात पर वो बात याद आती है
एक औरत के संग गुजरी वो रात याद आती है

दूर खड़ी परदे की ओट से आधी सुरत दिखरी थी
धुधले से चेहरे पर जुल्फे घनघोर घटा सी बिखरी थी

अधखुले वो लब उसके कुछ कहने को आतुर थे,
झुके झुके से चंचल नैना. बड़े ही चातुर थे

बुदबुदाती सी आवाज युं आई जैसे धड़कन बोल रही हो
युं मानो मेरे इर्द गिर्द खुशियॉ ही खुशियॉ डोल रही हो

धीरे धीरे से चल कर वो मेरे पास आई
कुछ ठिठक कर कुछ सकुचाई कुछ शरमाई

ग्लास भरा पानी का थमा गई वो हाथ में
एक पंखा लाई थी वो झलने अपने साथ में

जब हाथो ने हाथो को स्पर्श किया अनजाने में
युं लगा रात का सोया ऑख खुली हो महखाने में

पसीने की बुदें लुढ़क रही थी मुख पर इधर उधर
जैसे ओस की बुदें. सज रही हो पत्तो पर

जी किया की हाथ से ले कर पंखा उसको झल दु
कोमल से उस चेहरे पर बुदे अपनी हथेली से मल दु

बोल जो फुटे उसके मुख से तब मेरा ध्यान भंग हुआ
तब जाके कही मे वर्तमान के संग हुआ

लगी बेठने जड़ मे मेरे तब उसका ऑचल मुख चुम गया
मखमली एहसास से मेरा तन मन खुश हो झुम गया

गुपचुप गुपचुप हो रही थी रात के गलियारे में
चादँनी भी छन छन कर आ रही थी पर्दे के द्वारे से

खामोशी सी छाई थी उस कमरे की हवाओ में
जैसे एक साथ सभी फूल मुरझाए हो फिजाओ में

जी कर रहा था छाटँ के रख दु चुप्पी के बादल को
अपने तन से लपेट लु उसके नशीले ऑचल को।

बाहर से एक शोर सा आया दोनो डर से गए
एक दुजे की बॉहो मे टुट कर बिखर से गए।

मेरी मन की मुराद जैसे पुरी होने को थी
एक तरफ चाँद की भी धुरी पुरी होने को थी।

दरवाजे की खटखट ने जुदा हमको किया
खुद को समेट कर मैने समझा मन को लिया।

चलने को हुआ जो मैं उसकी नजरो ने रोक लिया
रुकना चाहता था मै भी पर खुद को रोक लिया।

वहॉ से तो चला आया पर मन वही छुट गया
नन्हा सा दिल मेरा एक झटके मे ही टुट गया।

छुटा हुआ वो पल आज भी जहन के अन्दर है
आज भी बह रहा दिल मे उस रात का समन्दर है।

बात बात पर वो बात याद आती है
गुजरी रात की वो बात याद आती है।

बात बात पर वो बात याद आती है
एक औरत के संग गुजरी वो रात याद आती है।

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Archna Goyal
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