एक अधूरा ख्वाब…

वेदप्रकाश रौशन

रचनाकार- वेदप्रकाश रौशन

विधा- कविता

वो भी क्या पल थे जिसमें,
मेरा हर शाम तेरे नाम था, मैं तुम्हें अपना मानता था,
तुम मेरी जान थी, और मैं सिर्फ तुम्हें जानता था|
न किसी की चाह थी, न दुनिया का फ़िक़्र था,
मेरे होठों पे सिर्फ तेरा ही ज़िक्र था |

मुझसे क्या भूल हुई, जो तू मुझे छोड़ गयी,
इतनी भी क्या जल्दी थी ,जो मुंह मोड़ गयी |
यदि था नहीं पसंद मैं, कभी तो बता देते,
तुम्हारी खुशियों के लिये हम खुद को भी मिटा देते|
थी क्या मेरी फरियाद बता तो देते,
संग जीना-मरना छोड़ो, बस एक बार प्यार जता देते |

जो किये थे साथ-साथ जीने के वादे,
वो भी कहीं पीछे छूट गए,
न जाने प्रीत के ये धागे कैसे टूट गए….||
अब न वो रूठना-मनाना था,
तुझसे मिलने का न कोई बहाना था|
कभी जो नज़रें मिल कर मुस्काती थी,
अब वो सिर्फ और सिर्फ आंसू बहाती है|
अब तो मिलने का वो ठिकाना भी छूट गया,
साथ-साथ घूमे थे जिस बगिया में कभी,
उस बगिया में जाना भी छूट गया|
कभी संगीत का अलग ही मज़ा था,
अब उन्हें सुनना भी एक सज़ा था|

अब सिर्फ यही सोचता हूं,जो थी कभी मेरी पनाहों में,
अब खो गयी होगी, किसी और की बाँहों में|
तू क्या गयी ये ज़माना पलट गया,
मेरे लिये तो मुहब्बत का मतलब ही बदल गया |
तुझे पाने के जो ख्याल आते थे,
बदल कर अब भुलाने के आने लगे|
अब दिन गुजरता है तुझे भुलाने में,
रात गुजरती है दिल को मनाने में|

अब तो सारी ख्वाब अधूरी रह गयी,
मुहब्ब्त की चाह भी खत्म हो गई,
मैने जिसे चाहा वो अब मेरी नही, गैर हो गयी|
मेरी पलकें आज भी नम हैं,
कुछ और नही सिर्फ तुम्हे खोने का गम है|

फिर भी मुझे सिर्फ तेरी आस है,
जिंदगी भर तुझे पाने की प्यास है|
कभी छुआ नहीं था शराब मैंने,
आज गम में रिश्ता रम से जुड़ गया|
और कुछ नहीं, दुख सिर्फ़ इतना है ,
तुझे न पा कर भी मैं मौन रह गया……….

-वेदप्रकाश रौशन

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वेदप्रकाश रौशन
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हिंदी का उपासक, सहित्य प्रेमी । सांस्कृतिक बचाव के लिए एक छुपा हुआ छोटा सा कलम का पूजारी । विभिन्न विधाओं में रूचि के अनुसार लेखन करता हूँ । लेख तथा कहानी विशेष तौर से लिखना पसंद करता हूँ ।।

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