उड़ान

satyendra agrawal

रचनाकार- satyendra agrawal

विधा- कविता

मन उमंगो के आसमान में उड़ने लगा
राहे स्वयं राह दिखाने लगी
राते स्वयं रोशन होने लगी
जब से मिली हो तुम
जिंदगी स्वयं मुस्कराने लगी
मन कहता है
पहाड़ो की वादियों में ढलती शाम हो
शाम के झुरमुट में पेड़ो के लम्बे साये हो
नदी के कलकल संगीत में
बहती समीर हो,बहती समीर में
तुम्हारा लहराता आँचल हो
आकांषये यो बढ़ने लगी
जिंदगी स्वयं मुस्करानी लगी

डॉ सत्येन्द्र कुमार अग्रवाल

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satyendra agrawal
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चिकित्सा के दौरान जीवन मृत्यु को नजदीक से देखा है ईश्वर की इस कृति को जानने के लिए केवल विज्ञान की नजर पर्याप्त नहीं है ,अंतर्मन के चक्षु जागृत करना होगा

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