उलझे उलझे बाल

RAMESH SHARMA

रचनाकार- RAMESH SHARMA

विधा- कुण्डलिया

मैंने अपने हाथ पर,ज्यों ही रखा गुलाल !
याद किसी के आ गये, .गोरे गोरे गाल !
गोरे गोरे गाल , और वो होंठ गुलाबी !
उलझे उलझे बाल, नशीले नैन शराबी !
आयेंगे वो याद,नयन उसके फिर पैंने!
नही लगाया रंग,अगर जो अबके मैने! !
रमेश शर्मा..

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अपने जीवन काल में, करो काम ये नेक ! जन्मदिवस पर स्वयं के,वृक्ष लगाओ एक !! रमेश शर्मा

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