उचकन ।

Satyendra kumar Upadhyay

रचनाकार- Satyendra kumar Upadhyay

विधा- लघु कथा

क्या ? हुआ रघु ! हॅसते हुए उसके मित्र श्यामू ने पूॅछा ही था कि रघु भी खिल-खिलाकर हॅसते हुए बोला ; भाई बस जरा सा ! साहेब को आज चिढ़ा दिया है तो वह थोड़ा उचक गये हैं । श्यामू बोला चिंता न करो मित्र तुम्हारा सवासेर मैं हूॅ न सॅभालने के लिए । दोनों ही साथ ही भर्ती हो विभाग के मुख्य मिस्त्री जो बन बैठे थे और भर्ती स्थान से ही रिटायर भी होना था , सारे नियम दीमकों के हवाले जो कर दिए थे इनलोगों ने ।
तभी उचके हुए और अपने ही आदेशों की धज्जियाॅ उड़ाने वाले रघु को बुलाया तो वह ; गिरगिट से भी जल्दी रंग बदलते हुए अपने मातहतों पर सारी गल्ती झोंकता चला गया था , साथ ही खुद के लिए लाचारी दिखा ! बस , अंग्रेज़ी में "साॅरी" बोलता चला गया । साहेब की उचकन कुछ कम हो गयी थी उसकी रंग बदलती शैली देख कि वरिष्ठ होकर कैसी सफाई से मातहतों पर उसकी झोंकाई देख ।
उसने विषैली मुस्कान फेरते हुए कहा साहेब जाऊँ अब ! सारा काम मैंने खत्म करवा दिया है । और मूक सहमति मिलते ही जाते-2 पुनः बोला कि साहेब ! सामान की आलमारी की चाबी जो कि उसी के जिम्मे थी एक नशेड़ी मातहत पर खोने का आरोप लगा !फुर्र हो गया । साहेब की अगली उचकन देखने के पहले ।
तभी उसका मित्र श्यामू आया बोला , साहेब आजकल थाने को बीस हजार रूपया दे किसी का भी मर्डर करा ! साफ बचा जा सकता है ।
यह सुन उचकन में बेइंतहा बढ़ोतरी देख वह भी चुपचाप निकल गया।और श्यामू भी जाकर रघु के साथ अगले चौराहे पर मजे से चाय की चुस्कियाॅ ले रहे थे ; इन्हीं उचकनों पर ! नियम जो विलुप्त प्रायः जो हो गये थे ।

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Satyendra kumar Upadhyay
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