इश्क दरिया है आग का

सतीश चोपड़ा

रचनाकार- सतीश चोपड़ा

विधा- गज़ल/गीतिका

इश्क़ दरिया है आग का, तैर कर पार करेंगे दरिया को
डूब जाएँ तो भी मुनाफा है रिश्वत क्या देनी किसी खुदा को

सुनो तमाम पूँजी लगा दी है मैंने तो इश्क़ के बाजार में
अब देखें नुकसान मुझे होता है कि फायदा दोनों को

खुशबुओं को बुला लिया है मैंने इशारों से अपने करीब
अब देखें वो आते हैं कि नहीं आते है छोड़ के चमन को

उफ्फ लोग उड़ाने लगे हैं अब मजाक मेरी दीवानगी का
हमें अब इंतजार है कि कब आते हैं जवाब देने जहान को

हमने फैंसला छोड़ दिया है खुदा पर वो ही इंसाफ करेगा
सरारत आँखों की कसक दिल की सजा ना मिले रूह को

आसमान पर सूरज और तारों का अलग रूतबा जरूर है
पर कौन भला भूल जाए जो देख ले पूनम के चाँद को

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सतीश चोपड़ा
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नाम: सतीश चोपड़ा निवास स्थान: रोहतक, हरियाणा। कार्यक्षेत्र: हरियाणा शिक्षा विभाग में सामाजिक अध्ययन अध्यापक के पद पर कार्यरत्त। अध्यापन का 18 वर्ष का अनुभव। शैक्षणिक योग्यता: प्रभाकर, B. A. M.A. इतिहास, MBA, B. Ed साहित्य के प्रति विद्यालय समय से ही रुझान रहा है। विभिन्न विषयों पर लेख, कविता, गजल व शेर लिखता हूँ। कलम के माध्यम से दिल की आवाज दिलों तक पहुँचा सकूँ इतनी सी चाहत है।

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