*इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन* के साईड एफेक्ट पर एक कहानी

निर्मला कपिला

रचनाकार- निर्मला कपिला

विधा- कहानी

*इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन* जैसे अविष्कार ने आज कल जिस तरह एक व्यापार का रूप ले लिया है,जैसे कि कुछ लोग तो सही मे औलाद चाहते हैं इस लिये कोख किराये पर लेते हैं, मगर कुछ आधुनिक सोच की युवतियाँ जो केवल अपने करियर के लिये और अपने फिगर को बचाये रखने के लिये इस खोज का लाभ उठा रही हैं, उस के कुछ गलत परिणाम कुछ भावनात्मक पहलू भी हैं जिसे ध्यान मे रख कर ये कहानी लिखी गयी है।

संजीवनी { कहानी }

जैसे ही मानवी आफिस मे आकर बैठी ,उसकी नज़र अपनी टेबल पर पडी डाक पर टिक गयी। डाक प्रतिदिन उसके आने से पहले ही उसकी टेबल पर पहुँच जाती थीपर वो बाकी आवश्यक काम निपटाने के बाद ही डाक देखती थी। आज बरबस ही उसकी नज़र एक सफेद लिफाफे पर टिक गयी जो सब से उपर पडा था।उसके एक कोने पर भेजने वाले के स्थान पर *वी* लिखा था। पहचान गयी,पत्र विकल्प का था। क्या लिखा होगा इस पत्र मे?वो सोच मे पड गयी। कभी पत्र लिखता नहीं है । टेलीफोन पर बात कर लेता है। अब तो चार महीने से न टेलीफोन किया और न ही घर आया । पीछली बार भी एक दिन के लिये आया था और बहस कर चला गया। शायद मुझ पर रहम खाने आया था। सुधाँशू की मौत के बाद अकेली जो हो गयी हूँण ! मुझ से नौकरी छुदवा कर साथ चलने के लिये कह रहा था। हुउउ ! महज औपचारिकता ! जब मुझे मान सम्मान नहीं दे सकता, मेरी हर बात उसे बुरी लगती है– तो फिर साथ रखने की औपचारिकता कैसी? जैसे ही उसने लिफाफा खोला उस मे से एक और लिफाफा निकला जिस पर लिखा था कि इसे घर जा कर फुरसत मे पढें।

मानवी ने लिफाफा पर्स मे रख लिया मगर दिमाग मे हलचल थी कि पता नहीं इस लिफाफे मे ऐसा क्या है जो फुरसत मे पढने वाला है। एक क्षण के लिये सोचा कि आज कोई काम न कर के पत्र पढा जयी मगर उसी क्षण उसने अपना ईरादा बदल लिया। अपने काम और करियर से बढ कर उसके लिये उसके लिये कुछ मायने नहीं रखता था।तभी तो आज वो कम्पनी की एम डी बनी। ये पत्र तो छोटी सी चीज़ है अपने करियर के लिये उसे अगर विकल्प को भी छोडना पडे तो छोड देगी।

आजकल क्या मायने हैं औलाद के? बच्चे कहाँ माँ बाप का बुढापे मे ध्यान रखते हैं। वो क्यों किसी की परवाह करे। इन्हीं सोचों मे वो अपना काम करने लगी। मानवी ने अपने व्यक्तित्व और अपनी मान्यताओं से एक कदम भी आगे सोचना सीखा ही नहीं था। जीवन मे उसे सब कुछ सहज ही मिला। आधुनिकता और धन दौलत की पिपासा ने उसे संवेदनाओं से दूर कर दिया था। कागज़ के फूलों की तरह थी वो। जीवन के छोटे छोटे मीठे पल. रिश्तों की महक, ज़िन्दगी की मुस्कान सब कुछ उसकी दफ्तर की फाईलों मे गुम हो कर रह गया था। यूँ भी सुधाँशू की मौत के बाद काम के सिवा और रह भी क्या गया था उसकी ज़िन्दगी मे।अब विकल्प भी दूर होता जा रहा है। उसकी हर बात का विपरीत अर्थ लेता है।जैसे उसका विरोध करना ही विकल्प का एक मात्र ध्येय हो। वो सोचती के अपना — अपना ही होता है! विकल्प उसका नहीं हो सकता। क्या नहीं दिया उन्होंने विकल्प को? इतना बडा घर बार ऐशो आराम की ज़िन्दगी– हमारे काराण ही तो वो आई. ए. एस . बन पाया है। नहीं तो उसे जन्म देने वाली गरीब औरत उसकी सरकारी स्कूल की फीस भी नहीं दे पाती। सुधाँशू से उसे फिर भी लगाव था।उसका अपना बेटा जो था। तभी पिता की मौत के बाद उसने घर आना भी छोड दिया था।

पी. ए के अन्दर आते ही वो सतर्क हो गयी और अपना काम निपटाने लगी।

पाँच बजे अचानक उसे पर्स मे पडे लिफाफे की याद आयी। मन कुछ बेचैन सा हो गया। पता नहीं शायद सुधाँशू के बाद वो मानसिक तौर पर कुछ कमज़ोर हो गयी है— क्यों बेचैन है वो पत्र पढने के लिये? वो सात बजे से पहले कभी आफिस से नहीं निकलती थी— आज पाँच बजे ही उसने पर्स उठाया और आ कर गाडी मे बैठ गयी। पिछली सीट पर बैठते ही उसका मन हुया कि पत्र खोल ले मगर कुछ सोच कर वो रुक गयी। पता नहीं पत्र मे क्या होगा—- कही ड्राईवर ने शीशे मे से उसके चेहरे के भावों को पढ लिया तो? नहीं—- नहीं –।

जैसे ही वो घर का दरवाज़ा खोल कर अन्दर पहुँची बाहर सर्वेन्ट रूम से उसे देख कर बाई भी आ गयी।—-

"मेम साहिब् , चाय बना लाऊँ।"

"हाँ चाय बना कर यहाँ रख दो और तुम जाओ। आज खाना बाहर से फोन कर के मंगवा लूँगी।" कह कर वो टायलेट मे चली गयी

चाय रख कर बाई चली गयी। मानसी ने दरवाज़ा अन्दर से बन्द किया और बेड रूम मे पत्र ले कर बैठ गयी। पत्र खोला

"माँ"

चरण स्पर्श।

माँ लिखते हुये पता नहीं क्यों आँखें नम हो रही हैं और हैरत भी हो रही है।

मम्मी कहूँ तो शायद् ठीक रहेगा। क्यों कि पश्चिम के आधूनिकवाद की ओढनी— नहीँ— कवच पहन कर आप मम्मी कहलाना ही पसंद करेंगी। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि आपको अपने 27 वर्षों का लेखा जोखा दूँ जो आपने मेरे लिये किया है। बेशक मेरी बातें आज आपको कडवी लगेंगी मगर बिना सुने आप समझ ही नहीं पायेंगी कि मुझे आपसे शिकायत क्यों रहती है। हम दोनो का रिश्ता सहज क्यों नहीं रहा। मैं वर्षों से जमे मन मे विष को निकालने का एक अवसर माँगना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि हमारा रिश्ता हमेशा के लिये माँ-बेटे का पवित्र रिश्ता बन जाये। सब से पहले आपको ये बताना चाहता हूँ कि मैं आपके साथ सहज क्यों नहीं रहता।"

"माँ ये समझने के लिये पहले माँ के अर्थ और उसके वात्सल्य को समझना जरूरी है। माँ सृष्टी की अनुपम रचना है। इस पवित्र रिस्ज्ते के लिये वो अपने आप को मिटा देती है। मैं माँ के जितने रूप जानता हूँ— वो बताता हूँ, उनमे से तुम खुद तय करना कि तुम कौन सी माँ हो"

एक माँ देवकी होती है जो बच्चे को जन्म देती है। वो गर्भ धाराण से नौ माह तक बच्चे को पेट मे छिपाये, उसे अपने खून से सींचती है। पहले दिन से जब बच्चा कोख मे आता है वो उसकी कल्पना मात्र से रोमाँचित, पुलकित महसूस करती है। उसके भविश्य के लिये सपने बुनने लगती है। नौ माह तकलीफें सह कर भी उसके माथे पर शिकन तक नहीं आती । पेट मे बच्चे की जरा सी हलचल उसके मन मे उमंग भर देती है। यहीं से बच्चा बहुत कुछ सीखता है। यहाँ से उसे प्यार की संवेदना का एहसास होता है।अभिमन्यू ने चक्रव्यूह भेदना माँ के पेट मे ही सीखा था।गर्भ से बाहर आते ही बच्चा सब से पहले माँ क स्पर्ष पहचानता है।खून के रिश्ते के साथ साथ वो दोनो संवेदनाओं से भी बन्ध जाते हैं। इसलिये वो माँ से बहुत प्यार करता है। लेकिन तुम ने अपने करियर , और तुम्हारी फिगर खराब न हो, तुम ने सन्तान को जन्म देने का अवसर खो दिया। फिर सन्तान के प्यार की चाह कैसी? अगर मुझे खरीदा भी तो सिर्फ एक वस्तु बना कर रख लिया।"

" माँ के दूसरे पावन रूप को जानता हूँ वो है यशोधा माँ , जो बच्च्3ए को जन्म तो नहीं देती मगर अपने आँचल की छाँव देती है, पालन पोषण करती है, रातों की नीँद ,ापना सुख चैन उसके लिये लुटा देती है। बच्चे की किलकारिओं मे संसार का सारा सुख पा लेती है। उसकी जरा सी तकलीफ इन माँओं को बहुत बडा दुख लगता है। प्यार तुआग ममता से सराबोर माँ का संरक्षण पा कर बेटा सदा के लिये उसका ऋणी हो जाता है। उस माँ के आँचल की छाँव जीवन भर उसे सहलाती रहती है, उसकी लोरियों का संगीत, लय मे वात्सल्य का अनुराग उसे माँ से बान्धे रखता है। मगर हम दोनो के रिश्ते मे वो भी सुरताल नहीं बना।"

"तीसरी माँ होती है सौतेली माँ।सौतेली माँ भी अगर बच्चे को प्यार नहीं दे पाती तो उसके पीछे भी कई कारण होते हैं उसके लिये वो अकेली ही दोषी नहीं होती। उसे शादी का सुख भोगे बिना अपने कुछ सपनों अरमानों को उस बच्चे के लिये कुरबान करना पडता है ,जिस के लिये और भी बहुत से कारण हैं। फिर भी बहुट सी सौतेली माँये अपने सौतेले बच्चों से प्यार करती हैं। उनकी तफ्सील मे न जा कर यही कहूँगा कि वो शायद परिस्थितिओं मे बुरी बन जाती है। सपनो के टूट जाने का क्षोभ कभी न कभी उसके व्यवहार मे उभर आता है। मगर तुम्हारे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुया। मेरे कारण तुम ने जीवन से कोई समझौता नहीं किया तुम्हारे कोई सपने नहीं टूटे बल्कि मुझे ले कर अपने सपने पूरे किये अपने करियर के लिये ममत्व को छोड दिया।"

"माँ बुरा मत मानना , मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि तुम्हें कौन सी माँ समझूँ? वैसे भी आपको रिश्तों नातों से मोह ही नहीं है। बाकी रिश्तेदारों से इसलिये मेल जोल नहीं रखा कि वो आपकी पद प्रतिष्ठा का लाभ न उठायें। उन सब को आप मतलवी समझती हैं। आपने भौतिक सम्पदाओं को ही जीवन माना है और उसी मे आप निवेश करती हैं। जीवन मे प्यार सम्मान और रिश्ते पाने के लिये मानवीय संवेदनाओं प्यार और त्याग का निवेश करना पडता है।"

"नीम का पेड लगा कर आम पाने की आशा कैसे की जा सकती है? अपने मातहतों का सैल्यूट पा कर आप गर्व करती हैं पर क्या उन अपने अधीन्स्थ के अतिरिक्त कभी किसी क सम्मान पाया? मैं आप पर अंगुली नहीं उठा रहा मगर ये समझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि हम दोनो मे कौन सा प्यार है? किस सम्मान की आशा आप मुझ से करती हैं उसमे आपने क्या निवेश किया? मगर मैं फिर भी चाहता हूँ कि मैं आपके करीब आऊँ। आपसे प्यार करूँ शायद करता भी हूँ तभी तो ये कोशिश कर रहा हूँ कि आप मुझे समझें, प्यार दें।"

"मैं हैरान हूँ कि आपने मेरे पिता जी से प्यार किया। इसका कारण भी शायद पहले उनका रुतवा और रईस परिवार ही था या शायद कच्ची उम्र का तकाज़ा था कि प्यार कर बैठी। मगर पिता जी ने आपके प्यार को बखूबी निभाया। अपने जीवन से आपके लिये सब समझौते किये और उसी समझौते का परिणाम हूँ मैं।"

आदमी अपने सुख के लिये कठिन परिस्थितिओं मे कितनी आसानी से विकल्प ढूँढ लेता है— अपने स्वार्थ के लिये दूसरे की बलि चढाने वाला विकल्प—- हाँ वही बलि का बकरा विकल्प हूँ मैं। पिता को अपने लिये वारिस चाहिये था मगर आप आधुनिक नारी अपने करियर, सौंदर्य और फिगर को बच्चे के लिये दाँव पर नहीं लगा सकती थी। महज अपने पति की इच्छा के लिये आपने विकल्प ढूँढ लिया—-*किराये की कोख *।"

मेरी नीँव ही धन दौलत,स्वार्थ,मजबूरी, और तृष्णाओं की रेत पर रखी गयी। कैसे भूल सकता हूँ कि मैं अपनी जन्म देने वाली माँ की मजबूरी और दूसरी माँ उन मजबूरिओं की खरीदार के बीच एक व्यवसायी डील का प्रोडक्ट हूँ।"

जिस वैग्यानिक ने इस *इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन् {जिसे आज कल *किराये की कोख *के रूप मे देखा जाने लगा है} उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उसका ये अविष्कार लोगों के स्वार्थ के चलते एक व्यापार बन जायेगा। इस तरह मैं किसी की चाहत नहीं बल्कि खरीदी गयी वस्तु बन गया। इस अमीर वंश को आगे बढाने के लिये एक गरीब वंश का अन्त हो गया। माँयही नहीं फिर मेरा आगे का सफर शुरू हुया, असली कहानी तो वहीं से शुरू होती है।—-

*माँ बात यहीं खत्म नही हुयी। उसके बाद मेरा पालन पोषण भी किराये की आया के हाथों ही हुया। तुम्हारे पास तो समय ही नहीं था मेरे लिये। मुझे खिलाना पिलाना नहलाना यहाँ तक कि सुलाना भी आयाके हाथ ही रहा। पिताजी जरूर मेरे साथ कुछ समय बिताते , कई बार वो भी तुम्हें नागवार गुजरता—–*\

पढते पढते मानवी को कई पल याद आये जब विकल्प को उसकी जरूरत थी मगर उसके पास समय भी नहीं था। समय हो सकता था अगर उसे दिल से उस बच्चे के लिये प्यार होता। वात्सल्य की एक किरण भी उसके मन मे कभी फूटी होती। उसे याद आया कि जिस दिन वो बच्चे को घर ले कर आयी थी, तब वो दोनो ही खुश थे सुधाँशू इस लिये कि उसे वारिस मिल गया था और वो इस लिये कि अब उसे बच्चे को जन्म देने का झंझट नहीं करना पडेगा। अगले दिन विकल्प कुछ बिमार हो गया। उसने बिस्तर पर उल्टी कर दी बस फिर क्या था मानवी का मूड उखड गया था।

"मैने पहले ही कहा था कि मुझे ये बच्चो वाला झंझट अच्छा नहीं लगता। कितनी बदबू आने लगी है कमरे मे। "

सुधाँशू चुप रहे मानवी ने आया को आवाज़ दी कि बच्चे और बिस्तर को उठा कर ले जाये । अगले दिन फिर जब सुधाँशू ने बच्चे को साथ सुलाना चाहा तो मानवी नाराज़ हो गयी। उसे अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे भी किसी और का होना अच्छा नहीं लगा। फिर कई बार ऐसा हुया जब बिमारी मे बच्चे को माँ की जरूरत होती है तो वो कभी दफ्तर मे तो कभी किसी पार्टी मे होती। बस आ कर आया से बच्चे का हाल पूछ लेती जब खेलता होता तो जरा सा बुला लेती। सोचते सोचते मानवी फिर से पत्र को पढने लगी। उसे अब अपनी गलती का एहसास होने लगा था शायद —

'माँ मुझे नहीं लगता कि मेरे जन्म दिन के इलावा आप कभी मेरे लिये एक खिलौना भी लाई हो। आप आफिस चली जाती,तो आया अपने बच्चे को ले आती। उसे गोद मे ले कर बालों को सहलाते हुये ,मेरे हिस्से का आधा दूध पिला देती। इस तरह चार साल का होते होते बहुत कुछ समझने लगा था।

कई बार मुझे नींद नहीं आती, मैं उसी तरह लोरी सुनना चाहता था जैसे आया अपने बच्चे को गोद मे ले कर सुनाती थी । मैं आपसे बतियाना चाहता, खेलना चाहता मगर आपके पास समय नहीं होता । आया के साथ सोते जब मुझे कभी नींद नहीं आती तो आया कडक आवाज़ मे मुझे डांम्ट देती और मैं डर से दुबक जाता। डर उसका बच्चा भी जाता मगर उसे वो अपनी छाती से लगा कर चुप करा लेती। क्या आप कल्पना कर सकती हैं मेरी त्रासदी का? आपकी आधुनिक सोच ने मेरा बचपन का सुख मुझ से छीन लिया। माँ के वात्सल्य से अतृप्त मेरी आत्मा आज भी उस संताप को झेल रही है*

पढते पढते मानवी के सब्र का बान्ध टूट गया आँखें उन सभी क्षणो को याद कर पश्चाताप मे बह रही थी। उसने कभी ऐसे सोचा ही नहीं था । भावुकता को वो कमजोरी समझती थी । सुधाँशू जैसा प्यार करने वाला पति पा कर ही वो दुनिया के बाकी रिश्तों की महक भूल गयी थी। अज भी उसे याद है कई बार विकल्प से कभी वो खुश मूड मे होती तो उसे अपने पास बुला लेती उस दिन सुधाँशू बहुत खुश होता और विकल्प को साथ सुला लेता मगर एक दो दिन बाद ही मानवी उकता जाती और फिर से उसे आया के पास भेज देती। वो पत्र छोड कर खिदकी मे आ कर खडी हो जाती है सामने सर्वेन्ट रूम के आंगन मे आया अपने बच्चे को गोद मे ले कर कैसे दुलार रही है, उसे लोरी सुना रही है और बच्चा खिलखिला कर उस से अठखेलियाँ कर रहा है— विकल्प ने भी इसी तरह कई बार मचलना चाहा होगा मगर उसने डाँट कर उसे चुप करवा दिया था। उसी आया के घर के सामने बन्धी गाय कैसे अपने छोटे बच्चे को अपनी जीभ से चाट कर सहला रही थी— उस मे कभी ऐसी ममता क्यों नही आयी—– क्या था जिसने मुझे इन भावनाओं से दूर रखा—- शायद उसका स्वार्थ था वो खुद को साबित करना चाहती थी व्यक्तित्व, करियर, और सौंदर्य पर ही उसने अपने ये अनमोल पल गंवा दिये थे —- खिडकी से हटने का उसका मन नहीं हो रहा था। बछडे और आया के बच्चे ने उसे विकल्प के बचपन की त्रास्दी और बाद मे उसके प्रति विकल्प के आक्रोश को समझा दिया था। आज उसे महसूस हुया कि औरत को कम से कम माँ का फर्ज़ नज़र अन्दाज़ नहीं करना चाहिये था। एक टीस उठी उसके मन मे विकल्प की उस अवस्था को याद कर उसके अन्दर कुछ पिघलने लगा था। फिर वो पत्र ले कर बैठ गयी

*माँ

मैं आया के बच्चों के संग बडा हुया खेला। उन से गन्दी बातें और गालियाँ सीखा । बडा होते होते तुम्हारे लिये मन मे आक्रोश पनपने लगा। तुम्हारा कहना न मानना ,बार बार तुम्हें तंग करना मेरी आदत मे शुमार हो गया। अपने अन्दर का आक्रोश निकालने के लिये मैं ऊल जलूल हरकतें करता ताकि तुम्हें दुखी कर सकूँ। पिता जी परेशान रहने लगी। फिर तुम्हारी राय पर मुझे रेज़िडेंशल स्कूल मे भेज दिया गया। मैं उस समय तीसरी कलास मे था। मुझे आज भी वो दिन याद है जब पिता जी मुझे छोदने आये तो उनकी आँखों मे आँसू थे। बहुत रोये थे मुझे गले से लगा कर शायद तुम भी उनके प्यार के बदले उन्हे कुछ नहीं दे सकी थी

। यूँ तो मैं हास्टल मे खुश था। पिता जी रोज़ फोन कर लेते और बातों बातों मे तुम्हारे लिये मेरे मन की मैल को साफ करने की कोशिश करते। तुम्हारी मजबूरियां बढा चढा कर बताते। हर माह मुझे एक दो दिन के लिये घर ले आते। उनसे जो प्यार मिला उसी के आसरे3 यहां तक पहुँचा हूँ। वो हर बार एक बात कहना नहीं भूलते* बेटा पढ लेना मुझे लाज मत लगवाना,तुझे बता नहीं सकता तुम मेरे लिये क्या मायने रखते हो मगर कुछ मजबूर हूँ*।कहते हुये वो आँख भर लेते। आज समझ आता है कि उनकी मजबूरी तुम थी। मैं बस उन्हें दुखी नहीं देख सकता था शायद इसी लिये इतना पढ गया*

अन्दर ही अन्दर शायद पिता जी को मेरा गम खाता रहा– शायद तुम्हारी निष्ठुरता भी—-। चलो मैं आई ए एस बन गया। लखनऊ मे मेरी पोस्टिन्ग हुयी। अब घर आना कुछ कम हो गया था। मेरे और आपके सम्भन्ध कभी प्यार दुलार या सम्मान के नहीं रहे।*

* इसी गम मे पिता जी को एक दिन दिल का दौरा पडा। आपके साथ उस समय एक आध मुलाज़िम को छोड कर कोई नहीं था। आता भी कैसे? तुम कभी किसी के

तुम ने घबरा कर मुझे फोन किया। मैं पहुँचा तो तुम पिता जी के बेड के पास बैठी रो रही थी। मुझे देखते ही तुम उठी और मेरे गले लग कर फूट फूट कर रोने लगी। अंदर तक भीग गया मैं। पिता जी की आँखों मे पहली बार हलकी सी सकून की एक किरण देखी। शायद तु7म तब भी एक बेटे के गले नहीं लगी थी बल्कि अपनी खरीदी हुयी वस्तु का प्रयोग कर रही थी। फिर भी बहुत अच्छा लगा कि कम से कम तुम्हें ये तो महसूस हुया कि जीवन म्के ऐसे पल भी आते हैं जब हमे रोने के लिये एक कन्धे की जरूरत पडती है। मुझे कुछ आशा भी हुई कि तुम अब अपनो का महत्व समझोगी।*

मानवी की आँखें नम हुई जा रही थीं —- सच कहा है विकल्प ने उसे तब किसी की जरूरत महसूस हुई थी जो इस दुख की घडी मे उसका साथ दे सके। कई बार विकल्प को भी इस की जरूरत पडी होगी मगर वो समझ न पाई— पत्र फिर से आगे पढने लगी—

*पिता जी कुछ संभले तो उन्हें घर ले आये। मैने लम्बी छुट्टी ले ली थी,क्यों कि इस दुनिया मे एक ही इन्सान मेरा अपना था—-उन की खातिर मैं कुछ भी कर सकता था आप से समझौता भी। तभी से आपके साथ सहज् रहने की कोशिश करता। बहुत देर बाद उस दिन हम तीनों ने इकट्ठे खाना खाया था मुझे तुम से बातें करते देख पिता जी बहुत खुश होते। तुम्हारी बातें करियर से ले कर मल्टीनेशनल कम्पनी के बारे मे ही होती। मक़िं चाहता था कि तुम मुझ से मेरे बारे मे भी पूछो कि बेटा तुम अकेले कैसे रहते हो, खाना कहाँ खाते हो, अच्छा लगता है कि नहीं , अपनी सेहत का ध्यान रखते हो कि नहीं आदि आदि।*

*उस दिन हम तीनो खाना खा रहे थे तो पिता जी बोले,"मानवी देखो विकल्प हमारा कितना ध्यान रखता है।*

*वो तो ठीक है,इसे अब अपनी ड्यूटी पर भी जाना चाहिये। नई नई नौकरी है ,इतनी छुट्टी लेना भी ठीक नहींइससे करियर पर असर पडता है।*

*तुम ने अपनी बात कह दी मगर पिता जी की आँखों मे एक साया सा लहराया फिर भी उन्होंने साहस बटोरा—

*क्या ऐसा नही हो सकता कि हम दोनो रिटायरमेन्ट लेकर बेटे के साथ रहें।*

*सुधाँशू तुम होश मे तो हो?* फिर न जाने क्या सोच कर तुम ने बात बनाने की कोशिश की

* देखो हम अच्छे भले बेटे पर बोझ क्यों बनें? अभी मेरी प्रोमोशन होने वाली है। मुझे अभी और आगे जाना है।* कह कर तुम उठ गयी।

पिता जी ने मेरा हाथ थपथपाया और हम दोनो पिता जी के कमरे मे देर तक बातें करते रहे और तुम स्टडी मे रही।

उस दिन पिता जी ने मेरे साथ बहुत बातें की। सब से अधिक तुम्हारे बारे मे तुम्हारे सपनों और उडान के बारे मे। शायद वो एक भूमिका बना रहे थे कि मैं आपको समझूँ। पिता जी तुम से कितना प्यार करते थे– एक पल के लिये भी तुम्हें नाराज़ या उदास नहीं देख सकते थे। उस दिन उन्हों ने मुझ से वादा लिया था कि अगर उन्हें कुछ हो जाये तो मैं आपका ध्यान रखूँ चाहे कुछ भी हो। सच मानो मुझे उस दिन आपसे ईर्ष्या होने लगी थी पिता जी को मुझ से अधिक आपकी चिन्ता थी।*

पढते हुये मानवी के सब्र का बाण्ध टूटने लगा था— आँसो अविरल बह चले थे। सुधाँशो को याद कर । सक़्च मे सुधाँशू का प्यार सच्चा था। उसने तो कभी सुधाँशू के बारे मे कभी ऐसे सोचा ही नहीं था कि सुधाँशू के लिये कभी कुछ किया हो आज उसे बहुत कुछ विचलित करने के लिये काफी था। फिर पत्र पर न्गाह गयी

*माँ मेरे चाहने जीवन मे कभी हुया है कुछ भी? पिता जी ठीक हुये ,मैं लखनऊ लौट गया। मैं अपने जीवन के कोरे कागज़ पर रंग भरने की सोच ही रहा था, मैं पिता जी की खुशी के लिये आपके साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश करना चाहता था। वषों से रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिश कर रहा था फोन पर तुम से बात करता। मगर मन की मन मे रह गयी। कुछ दिन बाद ही पिता जी के हमे छोड जाने की खबर ने मुझे तोड दिया। हम दोनो के बीच का सेतु टूट गया था। तुम्हाक़्रे दुख को मैं समझ सकता था मगर मेरे दुख को समझने वाला कोई नहीं था।

* मैं साये की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहता था । पिता जी के बचन को निभाना चाहता था। तुम से प्रेम बाँटना चाहता था— तुम्हें सांत्वना देना चाहता था— मगर तुम्हें अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे दूसरो का हस्तक्षेप पसंद नहीं था। तुम ने मौन धारण कर लिया। तुम ने एक बार भी मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा,सांत्वना एक शब्द नहीं कहा। मैं अनाथ हो गया था।

* अंतिम रस्मे पूरी हो गयी। रिश्ते दार जा चुके थे

रहते भी क्यों जैसी औपचारिकता आप निभाती आयीं थीं वही वो निभा कर वले गये।
अंतिम रस्मे पूरी हो गयी। रिश्ते दार जा चुके थे

रहते भी क्यों जैसी औपचारिकता आप निभाती आयीं थीं वही वो निभा कर वले गये।

मैं पिता जी के वचन को पूरा करने के लिये आपसे बात करने रुक गया था। मैं तुम्हें अपने साथ ले जाना चाहता था। तुम से बात की तो तुम ने कह दिया कि मैं नौकरी नहीं छोद सकती। साथ ही मुझे परामर्श दे डाला कि अगर तुम चाहते हो तो मैं यहाँ तुम्हारे लिये एक कम्पनी खोल सकती हूँ। और कहा कि मैं अकेले रह सकती हूँ तुम अपने करियर को देखो।

* मुझ अतृप्त की कितनी बडी परीक्षा लेना चाहती थी आप। मैं निराश हो गया। आपका तर्क था कि अगर मैं काम मे व्यस्त रहूँगी तो सुधाँशू के गम को भूल पाऊँगी, दूसरा मैं तिम पर बोझ बनना नहीं चाहती।क्या यही दुख हम दोनो मिल कर नहीं बाँट सकते थी? मैने तो सुना था कि माँ बाप बच्चों पर बोझ नहीं होते । बच्चे कभी उनका कर्ज़ नहीं चुका सकते। मगर माँ वो आपकी सोच थी मैं ऐसा नहीं सोचता था। मुझे लगता था कि मैं आपका और आप मेरा बोझ बाँट लेंगी— जीवन भर की अतृप्त इच्छाओं का बोझ। खैर सारी आशायें छोड मैं फिर से लखनऊ आ गया। आते वक्त पिता जी की कुछ फाईलें और एक डायरी आप से बिना पूछे उठा लाया था। इतना तो उन पर मेरा हक बनता था। मुझे लगा था कि शायद मैं फिर कभी लखनऊ न आ पाऊँगा।यहाँ भी मन नहीं लगता कई बार आपको फोन किया महज औपचारिक बातें हुयी। मैं उसके बाद घर नहीं आया।*

* अभी एक दो दिन पहले मैने पिता जी के डायरी खोली। तब बिना देखे ही रख ली थी। उसमे पिता जी ने मेरे लिये एक लिफाफा रखा था। खोला तो पिता जी का पत्र था। शायद उन्हें आभास हो गया था कि वो अधिक दिन जिन्दा नहीं रहेंगे– इस लिये आखिरी प्रयत्न करना चाहते थे हम दोनो के बीच की दूरी मिटाने के लिये। पत्र ये भी बहुत बडा है मगर उसमे से कुछ अंश आपको भेज रहा हूँ– ताकि आप मेरे इस पत्र का आशय समझ सको।*

ये पहला पत्र जो मेरे लिये न होकर आपके लिये ही था

बेटा विकल्प !

पता नहीं मैं ठीक हो पाऊँगा या नहीं। अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी आत्मा भटकती रहेगी। तुम्हारे साथ हुये अन्याय से और मानवीतथा तुम्हारे बीच तनाव को ले कर। बेटा! तुम दोनो मुझे बहुत प्रय हो तो क्या मेरी आत्मा की शान्ति के लिये तुम दोनो एक प्रयास नहीं कर सकते? मानवी मेरी कम्ज़ोरी रही हैउसे बहुत प्यार करता हूँ मगर उसे कुछ कहने का साहस नहीं कर पाता। इस लिये तुम्हें एक बात समझाना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि तुम मेरी बात को जरूर समझोगे। मानवी दिल की बुरी नहीं है ये यकीन मानो। उसका दोष भी नहीं है, वो जिस आधुनिक महौल मे पली है, जैसे उसे संस्कार मिले हैं वो वैसी ही है—- भावनाओं से दू, प्रेकटीकल्, अति महत्वाकाँक्षी। मक़िं इसी तथ्य को मान कर ,उसकी हर सोच के साथ समझौता करता चला गया। यहीं पर मैं गलत हो गया। ये बात मैं अब जान सका हूँ। दाँपत्य जीवन तो बचा रहा मगर कुछ चाहतों की वजह से मैं भी अतृप्त रहा। तुम्हारे जन्म के बाद मुझे अपनी गलती का एहसास हुया।मगर तब तक देर हो चुकी थी मानवी से कुछ भी कहना बेकार था। मैने उससे बहुत प्यार किया उसके इस भ्रम को इस जीवन सन्ध्या मे तोडना नहीं चाहता। वो भी मुझे बहुत चाहती है मगर उसका अन्दाज़ अलग है। वो मेरे बिना जी नहीं पायेगी। अगर अपने पिता की अत्मा की शाँति के लिये कुछ कर सकते हो तो बस उसे समझने की कोशिश करो और अपने सब गिले भूल जाओ। वो उपर से जितनी कठोर लगती है दिल से उतनी ही कोमल है। वो घुट घुट कर मर जायेगी मगर अपने दिल की बात किसी से नहीं कहेगी। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ— अपनी वंश बेल बढाने के लिये मैने तुम्हारा बचपन तुम से छीन लिया माँ का प्यार छीन लिया। क्षमा चाहता हूँ मेरी अन्तिम इच्छा पूरी कर सको तो अपनी माँको अपना लो।* तुम्हारा गुनहगार पिता

पत्र पढते हुये मानवी के सब्र का बाँध टूट गया ओह उसने अपनी सोच के आगे क्यों कभी सोचने देखने की जरूरत नहीं समझी । मैने सुधाँशू के साथ इतना बडा अन्याय कर दिया और उसने उफ तक नहीं की—– सोचते हुये मानवी विकल्प का पत्र फिर पढने लगी——

*माँ आज फिर से मै एक प्रयास कर रहा हूँ और करता रहूँगा पिता जी के लिये तुम्हें समझने की कोशिश कर रहा हूँ। तुम सोच रही होगी कि अगर मैं रिश्ता सुधारना चाहता हू तो पत्र मे अतनी कडवाहट क्यों भरी? शायद आप नहीं जानती जो कभी अनकहा मन मे रह जाता है वो कभी जीने नहीं देता कभी न कभी सिर उठा लेता है, सालता रहता है। अपने दिल मे तुम्हारे लिये स्थान बनाने के लिये अपने दिल से इस मवाद को निकालना जरूरी था। और मेरा है भी कौन जो मेरे दुख बाँट सके। बहुत कुछ इस लिये भी कहा है कि तुम भी मेरे इस क्षोभ को समझ सको। तुम मेरे बारे मे कुछ नहीं जानती— कुछ भी नहीं— तुम्हारा बेटा किस यन्त्रना से गुज़र रहा है। जब ये दर्द तीर की तरह तुम्हारे दिल मे चुभेगा तभी तुम मुझे जान पाओगी। मैं आज आपकी आत्मा को झकझोर देना चाहता हूँ।*

*माँ खिडकी के सामने सडक के उस पार गाय खडी है। बछडा उचक उचक कर कितनी उमंग से उसका दूध पी रहा है— और गाय बछडे को प्यार से चाट रही है— शायद ये दुनिया का सब से अनमोल सुख है, तृप्ति है जिस से मैं वंचित रहा हूँ। उसके पास ही एक पेड पर चिडिया अपने घोंसले के पास बैठी है। वो बाहर से दाना चुग कर लाती है और खुद अपने बच्चों के मुंह मे डालती है— बच्चों की चोंच से चोंच मिला कर प्यार का इज़्हार करती है। माँ क्या इन्सान जानवर से भी बदतर हो गया है पशु पक्षियों की मांयें नहीं बदली फिर इन्सान के माँ बाप क्यों खुदगर्ज़ हो गये हैं। किसी बच्चे को माँ की गोद मे देखता हूँ तो मन मे टीस उठती है। पता नहीं मुझे जन्म देने वाली माँ की क्या मजबूरी थी ,जो अपनी ममता का गला घोंट दिया। मेरा बचपन तो इस आधुनिकता की भेंट चढ चुका है नगर बाकी जीवन तो बचा सकती हो। आज अपने अन्दर का हर दर्द आपकी आत्मा मे चुभा देना चाहता हूँ मैने सुना है कि पूत कपूत हो सकता है पर माता कुमाता नहीं—- आज मैं देखना चाहता हूँ कि क्या तुम मुझे वो संजीवनी दे सकती हो—- माँ के वात्सलय और स्नेह की संजीवनी—- माँ मैं जीना चाहता हूँ—– बस एक बार बेटा कह कर प्यार से मुझे पुकारो गले लगा लो माँ—-* तुम्हारा विकल्प ।

पत्र समाप्त हो चुका था—– एक जलजला आया था मानवी के दिल मे जो उसके व्यक्तित्व को हिला गया —- किस दुनिया मे जी रही थी वो— उसके सामने ज़िन्दगी के सुन्दर पल बिखर रहे थे मगर वो देख न पाई—- पहले सुधाँशू —- फिर विकल्प?—–। अब क्या बचा है उसके पास । दौलत और पद प्रतिषठा के अहं मे किसी की भावनाओं को कभी समझा हे नही। —- सुधाँशू हर पल पास होते हुये भी कितने अकेले थे—- और विकल्प— अनथ संतप्त इतना आक्रोश और मन मे इतनी आग जलाये कैसे जी रहा है वो—- फिर भी मेरा सहारा बनना चाहता है और एक मैं कि उसके पिता की मौत पर उसे सहला भी न पाई। उसे लगा कि विकल्प की इस आग ने उसकी अत्मा मे जमी संवेदनहीनता की बर्फ कोपिघला दिया है—– और वो आँसू बन कर आँखों से बह रही है— आँसू बहे जा रहे थे — अविरल — कहीं दूर 3 बजे के घँटे की आवाज़ सुनाई दी—- बरबस ही उसके हाथ टेलिफोन की तरफ बढ गये— वो विकल्प का नम्बर डायल कर रही थी—- शायद उसकी बची ज़िन्दगी के लिये संजीवनी देना चाहती थी–

*हेलो* दूसरी तरफ से आवाज़ आयी

*बेटा*—– आगे एक शब्द न बोल सकी।

*माँ* —– और दोनो निशब्द जाने कितनी देर आँसू बहाते रहे।—— समाप्त

हमारे वैग्यानिक अपनी ज़िन्दगी के सब सुख छोड कर हमारी सुख सुविधा के लिये नये नये अविष्कार करते हैं मगर हम अपनी महत्वाकाँषाओं व तृष्णाओं को पूरा करने के लिये उनका दुरुपयोग करने लगते हैं। *इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन* भी उन बेऔलाद लोगों के लिये किया ग्या अविश्कार है जो किसी रोग या प्रकृतिक कारणो के चलते अपनी औलाद पैदा करने मे अस्मर्थ हैं लेकिन कुछ माँयें इसका उपयोग केवल अपने फर्ज़ से बचने के लिये, केवल अपने करियर और मातृत्व कष्टों को न सहन करना पडे इस लिये कर रहे हैं। इस के क्या परिणाम हो सकते हैं? इस कहानी की तरह जरूरी नहीं कि सभी बच्चे विकल्प की तरह समझदार हों असली ज़िन्दगी मे ऐसा होता भी कम है।तो वो क्या गलत कदम नहीं उठा सकते । ये कहानी बहुत बडी है इसे संक्षिप्त किया गया है विकल्प अपनी जन्म देने वाली माँ से भी मिलता है मगर पाठक बोर न हों लम्बी कहानी से इस लिये इसे यहीं समाप्त किया जा रहा है।

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निर्मला कपिला
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लेखन विधायें- कहानी, कविता, गज़ल, नज़्म हाईकु दोहा, लघुकथा आदि | प्रकाशन- कहानी संग्रह [वीरबहुटी], [प्रेम सेतु], काव्य संग्रह [सुबह से पहले ], शब्द माधुरी मे प्रकाशन, हाईकु संग्रह- चंदनमन मे प्रकाशित हाईकु, प्रेम सन्देश मे 5 कवितायें | प्रसारण रेडिओ विविध भरती जालन्धर से कहानी- अनन्त आकाश का प्रसारण | ब्लाग- www.veerbahuti.blogspot.in

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One comment
  1. निर्मला जी आँखें भीग गयी । कहानी अपने के साथ साथ बहुत कुछ सोचने को भी मज़बूर करती है । बिलकुल सही बात आपने कही । अविष्कारों का दुरूपयोग करना सर्वथा अनुचित है । बहुत अच्छी और शिक्षाप्रद कहानी