** इंसान हो तुम **

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- गीत

प्रारम्भिक बोल
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कश्तियां यूं ही
डूबती रह जायेगी
होंसला है जिसके हाथ
वो पार सागर कर जायेगा
तर जायेगा बिन पतवार
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इंसान हो तुम
इंसान हो तुम
किनारे वही रह जायेंगे
मौजे कितना बुलायेगी
मांझी कब तक पुकारेगा
जीवन है चलने का नाम
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इंसान हो तुम
तुम इंसान हो
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मत घबरा इन उलझनों से
एक दिन हो जायेगा पार
यार सुन अब दास्तां ग़म
कब तक ठहर पायेगा
जिद ना कर रुकने की अब
जीवन क्या ठहर जायेगा
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इंसान हो तुम
तुम इंसान हो
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इक पहर थोड़ा ठहर
चल फिर मंजिल पायेगा
जो बिता उसको जाने दे
अब पछताये क्या हो पायेगा
है इंसान तूं ये समझ
कब तक तूं रुक पायेगा
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इंसान हो तुम
तुम इंसान हो
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जीतेगा इकदिन हार के
जीवन को यूं वार के
इंसान हो तुम
तुम इंसान हो
हां तुम इंसान हो ।।
👍मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

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