इंतज़ार

Rashmi Singh

रचनाकार- Rashmi Singh

विधा- लघु कथा

अक्सर तुम कहा करते थे कि तुम सीधे सीधे शब्दों का इस्तेमाल किया करो। यूँ पहेलियों में बातें न किया करो और तब मैं बस इतना ही कह पाती थी कि, मेरे ये कुछ शब्द ही तुम्हारे पास रह जायेंगे अगर, मैं चली गई तो।

और तुम जब भी तन्हा होगे मेरे शब्दों को याद कर हँसा करोगे क्यू की, मैं नहीं चाहती की तन्हाइयों में भी तुम्हें तकलीफ़ हो और तुम कह देते ये तो महज़ बस कहने की बातें है ऐसा कुछ नहीं होगा। और मैं बस मुस्कुरा दिया करती थी ।

आज लंबे समय के बाद तुमने जब चैट पर "हेल्लो" बोला तो बहुत सी यादें ताजा हो गई। और मैं अपनी यादों के गुलदस्ते से कुछ मुरझाए तो कुछ, ताजा फूलों को चुनने लगी। उस वक़्त में पहुँच गई जब तुमने कभी कहा था कि नीला तुम हमेशा ऐसी ही रहना क्यू की तुम मुझे ऐसीे ही अच्छी लगती हो। उस वक़्त मुझे पता था कि तुम फ्लर्ट कर रहे हो, पर मैं बस मुस्कुरा कर रह गयी क्यू की हक़ीक़त जानती थी। और तुमने भी तो मुझे यही सोच कर पटाने की रिझाने की कोशिश की, की अकेली है ज़ल्दी मान जायेगी। पर मुझे तो पता था तुम नशे में हो और शायद थोड़े बीमार भी।

ठीक उसी तरह बीमार, जिस तरह अक्सर इंसान अकेला होने पर हो जाता है। बस इसलिए तुम्हें सिर्फ़ सुना करती थी और सोचती थी चलो, अगर मेरे मुस्कुराने से और सुनने से किसी का अच्छा होता है तो इससे मुझे क्या तकलीफ़ है पर, पता नहीं कब और कैसे तुम मेरे दिल के बंद दरवाज़े में समाते चले गए और मैं कब….मोम की तरह पिघलती गई….कब, दोस्ती को प्यार समझ लिया और कब, उस प्यार को हक़ समझ बैठी।

उस दिन बहुत दर्द हुआ था जब तुमने कहा था कि तुम मेरे क़ाबिल नहीं। तुमने मुझे टिस्यू पेपर की तरह इस्तेमाल करके फेंक दिया। और मैं अलग ही नहीं कर पा रही थी खुद को तुमसे। तमाम कोशिशों के बाद भी कहीँ एक उम्मीद थी पर, वो भी टूट गई जब तुमने फोन करके कहा "मैंने, शादी कर ली है"।

मैं काफी दिनों तक मौन रोती रही। और फिर ख़ुद को समझा लिया की मैं किसी के क़ाबिल नहीं। मैं तो नीला आकाश हूँ जो बस, सहारा बन सकता है किसी का साथ नहीं। और फिर मैं लौट आई अपनी ही दुनिया में। जहाँ मैं थी और मेरा अंश।

हाँ, मेरे पति ने भी तो यही कहा था कि मैं उसके क़ाबिल नहीं और फिर तुमने भी कहा। और आज उम्र के इस मोड़ पर तुम दोनों मिले मुझे और दोनों ने बस इतना ही कहा "लौट आओ नीला"।

अब मैं सवाल करती हूँ, "किसके पास लोटूँ ..?
उसके पास जिसने मेरे ज़िस्म पर इतने घाव किये जो आज नासूर बन बैठें है। या उसके पास जिसने दिल में इतने ज़ख़्म दिए की यक़ीन से यक़ीन ही ख़त्म हो गया।
आज जब तुम अकेले हो गए तो मेरी याद आ गई…। जब सब ने तुम्हारा साथ छोड़ा तो नीला के पास आना चाहते हो।

पर मैं क्यू वापस लौट आऊँ…….??
ज़िन्दगी के सारे बसन्त मैंने अकेले काट दिए। ज़माने के तानों को अकेले सहा। हर सुख दुःख का साथी ख़ुद को बनाया फिर आज जब तुम्हें मेरी ज़रूरत है तो तुम ये चाहते हो कि मैं फिर से आज तुम्हारा साथ बन जाऊँ।

नहीं, अब नहीं।
और सुनों आज जो मेरे शब्द तुम्हें सच्चे लग रहे हैं वो वास्तव में सचे थे। पर तब तुम्हें इनकी कद्र नहीं थी और आज तुम्हें मेरे इन्हीं शब्दों से प्यार है। इसलिए मुझे भूल नहीं सकते। ऐसा ही कहना हैं न तुम्हारा मुझसे। पर मैं किस प्यार के लिए किस वज़ह के लिए लौट आऊँ। है कोई वज़ह तुम्हारे पास…?? कोई एक वज़ह भी है तो बताओ…..??
रजत चुपचाप नीला को सुनता रहा और बस इतना ही बोल सका "प्लीज़ तुम बेवज़ह ही लौट आओ"।

फिर दोनों कुछ समय शांत एक दूसरे की धड़कन को सुनते रहे और फिर अचानक से नीला ने तेज़ आवाज़ में कहा "अलविदा" और फ़ोन रख दिया। बिना किसी इंतज़ार के। क्योंकि सही मायने में आज उसका इंतज़ार ख़त्म हो चूका था।

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