** आस्था ***

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- मुक्तक

दर्द जब पीर बन कर उभर गया
दिल का दुःख जाने किधर गया
पीड़ा पीड़ा पीड़ा वो कहता गया
दर्द ना जाने कब का पिघल गया ।।
👍मधुप बैरागी

आस्था श्रद्धारूपी सीढ़ियों के माध्यम से गन्तव्य तक पहुंचने वाली वो मंजिल है जो हासिल करने के बाद विश्वास न करने वाली कोई बात नहीं रहती है ,आस्था समर्पण की वह पूर्णावस्था है जहाँ पहुंचने पर कोई अन्य आप को तनिक भी विचलित नहीं कर सकता,गुमराह नहीं कर सकता लेकिन एक सम्भावना रहती है यदि अंध श्रद्धा है तो आप राह से भटक जायेंगे एवं अर्श से फर्श पर आते दे नहीं लगती वरन रसातल में जाने से अंध श्रद्धालु को कोई रोक नही सकता ।अतः श्रद्धा ,श्रद्धालु और श्रद्धा व अंध श्रद्धा को कसौटी पर कसकर देख लें तो ज्यादा अच्छा होगा ।।
👍मधुप बैरागी

बीज रूप में आया मैं था
कुछ विकसित हो दुनियां देखी ।।
आँखे खोली अनजाने में
बचपन बीता हंसने रोने में ।।
आया लड़कपन का दौर दूसरा
असमंजस में डाला था मुझको
निर्णय नहीं ले पाता मैं था
क्या करना क्या नही करना ।।
आया दौर जवानी का अब
कुछ करता मैं हूँ
कुछ करवाते वो है ।।
होना वही है जो विधि को मान्य
हो मानव मन मैं चाहे जो काम्य।।
👍मधुप बैरागी

Views 9
Sponsored
Author
भूरचन्द जयपाल
Posts 240
Total Views 2.9k
मैं भूरचन्द जयपाल वर्तमान पद - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिन्दी रचनाये 9928752150
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia