“आशिक तेरा मैख़ाने में”

Santosh Barmaiya

रचनाकार- Santosh Barmaiya

विधा- गज़ल/गीतिका

कल ही मिला था,आशिक तेरा मैख़ाने में।
छलका रहा था गम,भर-भर के पैमाने में।।

था दीवाना अपनी,आशिकी के नशे में चूर।
हर ख़ुशी से बेगाना,अपने ही शहर से दूर।।
था बहुत मजबूर, जैसे लूटा हो आजमाने में।।
कल ही मिला था,…………….।।

हालत थी उसकी जैसे,सदियों से खाया नही।
होकर खड़ा गिर जाता, जैसे पैर पाया नही।।
खुद को बिखरा चुका था,दूजे को सँवारने में।।
कल ही मिला था,…………….।।

कर रहे थे हाथ उसके,घुँघरू बाँध के मुज़रा।
देख मुझे शायद, याद का कोई दौर गुज़रा ।।
आँखों में आँसू,जैसे मदिरा भरी हो पैमाने में।।
कल ही मिला था,……………..।।

हर कसक दिल की, अदाएँ लग रही थी।
हर पल,दौर,महफ़िल गमों की सज रही थी।।
ऐ मोहब्बत न तड़पा,क्या मजा है तड़पाने में।
कल ही मिला था ,…………….।।
रचियता
सन्तोष बरमैया"जय"

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Santosh Barmaiya
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मेरा नाम- संतोष बरमैया"जय", पिताजी - श्री कौशल किशोर बरमैया,ग्राम- कोदाझिरी,कुरई, सिवनी,म.प्र. का मूल निवासी हूँ। शिक्षा-बी.एस.सी.,एम ए, बी.ऐड,।अध्यापक पद पर कार्यरत हूँ। मेरी रचनाएँ पूर्व में देशबन्धु, एक्स प्रेस,संवाद कुंज, अख़बार तथा पत्रिका मछुआ संदेश, तथा वर्तमान मे नवभारत अखबार में प्रकाशित होती रहती है। मेरी कलम अधिकांश समय प्रेरणा गीत तथा गजल लिखती है। मेरी पसंदीदा रचना "जवानी" l

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