आवारा बादल

rekha rani

रचनाकार- rekha rani

विधा- गीत

कहाँ उड़ चले, कहाँ उड़ चले,
आवारा बादल कहाँ उड़ चले।
लगता है बादल हुए आज पागल ,
उन्हें न खबर वे कहाँ उड़ चले।
पुरवा हवा है यही जानती है,
कहाँ अपनी मंजिल यही जानती है।
बिना जाने समझे इसके संग उड़ चले।
हमें न खबर कि कहाँ उड़ चले।
लगता है पुरवाई यह सागर तक ही जायेगी।
बेसहारा सा हमको यह वहीँ छोड़ जायेगी।
मंजिल की खोज में ऊम्र बीत जायेगी।
आखिर हवा यह हमसे यूँही जीत जायेगी।
आंसुओं में घुल जाने को उधर उड़ चले।
हमें न खबर कि कहाँ उड़ चले।
न तो अपना घर है न कोईं ठिकाना।
पुरवा हवा के संग में जन्म बिताना।
इसके दम पे अपनी हंसी अश्क बहाना।
इसी के सहारे हमको पथ में बढ़ते जाना।
तभी तो बिना सोचे हम उड़ चले।
अपने तो सुख-दुख सारे इसी के ही संग हैं
इसी के सहारे अपनी जिंदगी मे रंग हैं।
आवारा पागल हैं पर कुछ तो उसूल हैं
अपना घर उजाड़ रेखा हम खिलाते फूल हैं
फिर न कहना कोई हम कि कहाँ उड़ चले
रेखा रानी

Sponsored
Views 70
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
rekha rani
Posts 15
Total Views 295
मैं रेखा रानी एक शिक्षिका हूँ। मै उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ1 मे अपने ब्लॉक में मंत्री भी हूँ। मेरे दो प्यारे फूल (बच्चे) ,एक बाग़वान् अर्थात मेरे पति जो प्रतिपल मेरे साथ रहते हैं। मेरा शौक कविताये ,भजन,लेखन ,गायन, और प्रत्येक गतिविधि मे मुख्य भूमिका निभाना। मेरी उक्ति है कौन सो काज कठिन जगमाहि जो नही होत रेखा तुम पाही। आर्थात जो ठाना वो करना है। गृ हस्थ मे कविताएं न प्रकाशित कर पाईं

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia