आयो, आयो, आयो रे वसंत

लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- कविता

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आयो, आयो, आयो रे वसंत,
छाई है जग में शोभा अनन्त।

बहे मंद – मंद शीतल बयार,
छेड़ जाये मेरे मन के तार।

खिले हैं सुन्दर फूल पलाश,
पीया से मिलन की है आस।

टेंसू के फूल लाल – लाल,
महके बहके हैं मेरी चाल।

लग गए हैं आमों में बौर,
दिल ना पाये कही भी ठौर।

ये मौसम जाने जादू-टोना,
बहके मन का कोना-कोना।

भवरों की मधुर-मधुर गीत,
दिल में रस घोले मन प्रीत।

सुनकर कोयल की कूक,
उठे मन में मीठी-सी हूक।

हवा में फूलों की सुगंध,
घुलते मादकता का गंध।

फूल-फूल पराग महके,
धानि चुनरिया मेरा लहके।

प्रकृति सौन्दर्य में निखार,
दहक उठे दिल में अंगार।

यह ऋतु अति सुहावनी,
सुखद बदलाव मनभावनी।
—लक्ष्मी सिंह 💓☺

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