आफत…..

शालिनी साहू

रचनाकार- शालिनी साहू

विधा- कहानी

आफत…
शाम का वक्त था बाजार की रौनक शुरू ही हुई थी कि मेरा महाविद्यालय से आना हुआ! अचानक ही एक हाय-हैलो वाली सखी सामने दिख गयी मुझे देखा तो हाय-हैलो हुआ उसके बाद उसने पूछा कहाँ से-मैनें कहा कॉलेज से आ रही हूँ! उसने कहा कहाँ पर है? मैंने कॉलेज का नाम बताया! दो-चार बातें हो ही गयी लेकिन उससे रहा ना गया वेतन पूछ ही लिया खैर मुझे जल्दी थी बताते हुए हम अपने गन्तव्य के लिए निकल पड़े! दूसरे साल उसी हाय-हैलो वाली सखी ने बी. एड में दाखिले के लिए मेरे कॉलेज को ही लॉक करवाया! और दिमाग तो देखो इतना अधिक कि प्रवेश के समय मेरा नाम भी बता दिया और बताया कि वो मेरी बहुत अच्छी मित्र हैं! जो कि मेरा कोई व्यक्तिगत सम्पर्क भी नहीं था उससे!सोर्स प्राचार्य से लेकर प्रवक्ता तक लगाने में कोई कोर-कसर नहीं! सहसा एक दिन मेरा घर ना जानते हुए, भी पूछते-पूछते घर आ पहुँची! घर पर पहले से ही कुछ मेहमान बैठे थे क्योंकि इतवार का दिन ही एक मिलता जिसमें घर के सारे कार्य और अपनों से मिलना हो पाता है! अब ये आफत मेरे घर आ पहुँची और पूरे तीन घण्टे दिमाग का दही बनाने में लग गयी आफत इतनी बड़ी हो गयी कि घर में बैठा अगला मेहमान हैरान-परेशान! एक ही बात को चार-पाँच बार मन अन्दर ही अन्दर झल्ला रहा था पर भारतीय परम्परा का अपमान भी तो नहीं कर सकते हैं ना क्योंकि हमारी संस्कृति और सभ्यता में "अतिथि देवो:भव"का एजेण्डा है! खैर जैसे-तैसे जान छुड़ायी और विदा किया लेकिन जाते-जाते एक आफत और मेरा मोबाइल नं ले लिया!
अब हर रोज दिन में लगभग दस बार फोन-यार थोड़ा वहाँ बात कर लेना हम कॉलेज जा नहीं पायेंगे तुम सब मैनेज कर लेना!क्योंकि हमारी कोचिंग चलती है! थोड़ा सबको समझा देना हमने कहा- ठीक है परेशान मत हो कोई असुविधा नहीं होगी!आप बिल्कुल मत परेशान होइये!लेकिन इतने से उनका दिल भरा नहीं शायद! उनको यह सही लगता था कि रोज पंच करेंगे तो प्रभाव अच्छा पड़ेगा! अब नियम पूर्वक
रोज पाँच-छ: बार फोन और हम यही कहते परेशान मत हो हमने बात कर ली है! पर उनका दिल फिर भी मुझे हर रोज दिन में चार-पाँच याद करता और वही सोर्स,सिफारिश वाली बातें और ऐसे पागलपन वाले सवाल की हद हो गयी थी बाकी कुछ नहीं!सुबह होते ही 10 से 12 कॉल लगातार फोन न उठने पर भी कॉल करना बन्द नहीं एक दिन सुबह समय की कमी होने के कारण फोन नहीं उठ पाया और कॉल की संख्या 10 थी उसे लगा कि मेरा नं देखकर फोन नहीं उठा रही है पर ऐसा था नहीं! शाम को महाविद्यालय से लौटते ही फिर नये नम्बर से फोन इत्तेफाक से सेलफोन हाथ में ही था फोन रिसीव हुआ फिर वही बात यार उनसे बात कर लेना दुनियादारी शुरू! आग तो लग गयी कि अभी पानी भी मुँह में नहीं पड़ा और ये आफत तैयार! बस क्रोध की ज्वाला भड़क ही गयी!लेकिन फिर भी मन को बहुत समझाया कि किसी को बुरा ना लगे! और मुझे साफ-सुथरे शब्दों में कहना पड़ा! बहन हम कुछ नहीं कर सकते! तुम अपने स्तर से स्वयं बात कर लो! और फोन रख दिया वो जाने क्या कह रही थी! ….
कसम से उस दिन से आधा सर का दर्द दूर हुआ और इस आफत से जान छूटी! क्योंकि अब फोन का आना बन्द हुआ!
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शालिनी साहू
ऊँचाहार, रायबरेली(उ0प्र0)

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