मेरी गुड़िया

लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- कविता

👧👧👧👧👧
आफत की पुड़िया, है मेरी गुड़िया,
हरदम करती है शैतानी।
बात किसी की कभी न सुनती,
करती वही जो मन में ठानी।
👧👧👧👧👧
भोली-भाली नादां है ये
दुनिया से बिल्कुल अनजानी।
ना कुछ सोचे, ना कुछ समझे,
यह करती रहती है मनमानी।
👧👧👧👧👧
खिल-खिल कर हँसती रहती है,
कभी भर लाये आँखों में पानी।
मीठी-मीठी मिश्री- सी है बोली,
बातों में तो है सबकी ये नानी।
👧👧👧👧👧
नटखट, चुलबुल प्यारी-प्यारी,
परियों जैसी है मेरी रानी।
मन हर्षाती मुझे लुभाती,
चाँद सी सुन्दर मेरी भवानी।
👧👧👧👧👧
तन कोमल तितली सी,
मन निश्छल पावन रूहानी।
हर पल नई शरारत उसकी,
लगती है मनभावन सुहानी।
👧👧👧👧👧
—लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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