आदमी

maheshjain jyoti

रचनाकार- maheshjain jyoti

विधा- गज़ल/गीतिका

पिसते' पिसते आज बौना हो गया है आदमी ।
मातमी ख़त का सा' कौना हो गया है आदमी ।।1

जिन्दगी पर इन्द्रधनुषी तन गई है वासना ।
देखिये कितना घिनौना हो गया है आदमी ।।2

रेजगारी से भुने व्यवहार हैं इंसान के ।
घटघटा कर नोट पौना हो गया है आदमी ।।3

रेशमी कालीन तो शोकेस में सज कर रखे ।
चीथड़ा कोई बिछौना हो गया है आदमी ।।4

ये पढ़ा भूगोल में था सारी' दुनियाँ गोल है ।
पर मुझे लगता तिकौना हो गया है आदमी ।।5

हाथ माथे पर टिकाये है कहीं कौने पड़ा ।
एक टूटा सा खिलौना हो गया है आदमी ।।6

-महेश जैन 'ज्योति',
मथुरा ।
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maheshjain jyoti
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"जीवन जैसे ज्योति जले " के भाव को मन में बसाये एक बंजारा सा हूँ जो सत्य की खोज में चला जा रहा है अपने लक्ष्य की ओर , गीत गाते हुए, कविता कहते और छंद की उपासना करते हुए । कविता मेरा जीवन है, गीत मेरी साँसें और छंद मेरी आत्मा । -'ज्योति'

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