आदमी में गांव

Neelam Naveen

रचनाकार- Neelam Naveen "Neel"

विधा- कविता

किसी पुरानी किताब
के कई छुटे पन्ने धुमिल
स्याही के आखरों जैसे
क्ई गांव बुड़ा गये और
कुछ पलायन में खो गये,
व निगल गयी आधुनिकता !
सही में विकास की राह
कई बार बेमानी होती है
सीधे सरल लोग जो हैं
गुम  जाते व खो जाते हैं
और कौन न रिझेगा सपने सरीखी
बातों से, गर पढ लिख जायेंगें !
पुराने बुढे गांव भी एकबार
पहल कर जायेंगें, यदि
भुल से कदम बढ जाते
उन पगडंडियों में कभी
तो टुटे बचे अवशेष आज
कई कहानियां कहती हैं !
कहीं मौन सहमति में लोग
अनायास आज को गले
लगाने के हौसले बस
चाहे अनचाहे ही सही
अब बुलंद कर रहे हैं
मन के लिबास बदल रहे हैं !
बस बातों में गावं कभी
राजनीति ,कभी  धर्म  में,
बजट पालिसी के पन्नों
व विकास की भाषा से
गरीब की पीठ में चने भुनते
बड़े ही फल फूल रहे हैं !
जहां मिट्टी कुरेदो उधर एक
नया उगता नेता,और पद हैं,
पदों की  चाह राह में वादे 
फिर विकास टटोलता आदम
ऐसे ही गांव में कहीं आदमी
आदमी में गांव शायद बचा है !!!!!!

नीलम  "नील" Date 7.10.16

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