आत्मा का राम

ललित नाथ

रचनाकार- ललित नाथ

विधा- लघु कथा

*आत्मा का राम*
फटी हुई कथडी में लेटा आत्मप्रसाद अपने जीवन के अंतिम दिन गिन रहा है। उसके ही पास सिरहाने में उसकी पत्नी शांति हाँथों में दवाई लिए बैठी है।सुबह और दोपहर की दवा आत्माप्रसाद पानी के साथ सेवन करता है।परंतु वैध के अनुसार सांझ की दवा दूध के साथ देना है।
इसलिए शांति पिछले आधा घंटे से अपनी बहू रजनी को आवाज लगा रही है। जो एक घंटे से अपने मोबाइल फोन में बात करने में व्यस्त है,और शांति की आवाज को जानबूझ कर अनसुना कर रही है। बहू का बर्ताव शांति के शांत मन को अशांत कर देताहै।
परन्तु फिर भी वह आँखों में आंसू लिए करुण आवाज में अपनी बहू को एक गिलास दूध के लिए आवाज देते रहती है।
अचानक बहार से राम चला आता है। राम,आत्माप्रसाद और शांति की लोंति
संतान है। माँ को व्यथित देख,राम मां से पूछता है। शांति के कुछ कहने से पहले ही रजनी अंदर से बड़-बडाती हुई गुस्से में चली आती है।
हाँ हाँ हाँ,अब कर दो चुगली,करवा दो झगड़ा में तो हूं ही बुरी।और (राम की तरफ देखकर बोली )तुम्हारे मां-बाप को इसके अलावा कोई काम तो है नहीं। अब आप ही बताओ,इतनी गर्मी में दूध वाला कितना कम दूध दे रहा है। उस पर चाय का आये-गये का,और फिर चार टाइम मुन्नी भी तो पीती है। इतने पर भी जो बचता है,तो इन्हें दो। अब इन्हें सेहत बनाने की क्या जरुरत,दवा पानी से भी तो दी जा सकती है।और आज तो एक ही गिलास दूध बचा है,रात में मुन्नी क्या पीयेगी।
इतना कहकर,रजनी पैर पटकते हुए अंदर चली जाती है।
राम,माँ की ओर देखकर कहता है क्या माँ तू भी समझ नहीं सकती वेबजह उसे ही बुरा भला कहती है। सही तो है दवा पानी से ही दे दो। वैसे भी पिता जी को दूध पिलाने से क्या फायदा,उनके लिए तो सब पानी है। कहते हुए राम भी अंदर चला जाता है।
रह जाती है,शांति अपने बीमार पति आत्मा के पैर पर बैठ कर आंसू बहाती हुई। और सोचती है,जिस संतान को अपनी छाती का दूध पिलाया ।जिस बाप ने उसकी आवश्यकता पूर्ति और योग्य बनाने के लिए,अपना सम्पूर्ण जीवन गुजार दिया। अगर
उसका एक टका शूद ही मांगू,तो राम सात जन्मों तक नहीं चुूका सकता। कहते हुये, शांति अपने पति के पैरों में सर रख रोने लगती है।
सहसा! ही शांति के कानों में एक हिचकी के साथ राम-राम की आवाज सुनाई पड़ती है। घबराई शांति,अपने पति के चहरे की तरफ देखती है।और जोर से कीक पड़ती हैं।
क्योंकि,आत्मप्रसाद को अपने पुत्र राम का आसरा नहीं मिला। इसलिए उसकी आत्मा इस शरीर को छोड़,मोक्छ पाने परमेश्वर राम की शरण में चल देती है।अथार्त वह इस देह को त्याग देता है।उसकी मृत्यु हो जाती है ।और रह जाती है। अकेली शांति,चारो तरफ फैली शांति,शांति,शांति,,,,सिर्फ शांति,,,,,,,,,,,,,,,,,,।

ललित कुमार नाथ
हर्रई जागीर जिला-छिन्दवाड़ा
9479735164

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