आखिर!कब?

श्री एस•एन•बी• साहब

रचनाकार- श्री एस•एन•बी• साहब

विधा- लघु कथा

@आखिर! कब?@

"तुम इस हद तक जा सकते हो;मैंने कभी सोंचा भी नहीं था।तुम्हारे सीने में दिल नहीं पत्थर है;जो सिर्फ दूसरों को चोंट पहुँचाने का काम करता है।"-दाँत पीसते हुए रूपा ने बसंत को खरी-खरी सुनाई । "जब जिंदगी अपने लय में सरपट दौड़ती जाती है; उसे अपने सिवाय जब कुछ नजर नहीं आती तो समझ जाओ वह अपने अंदर कितना दर्द समेटे जी रहा होगा। आखिर! तुम मुझसे कहना क्या चाहती हो?" जवाब के इंतजार में बसंत रूपा को एकटक देखे जा रहा है । रूपा -"तुम शादी कब कर रहे हो?" बसंत -"हमारे चाह लेने मात्र से सबकुछ नहीं बदल जाता ।मेरे हालात मुझे इजाजत नही देते।मुझे कुछ वक्त और चाहिए।" बसंत ने अपनी मजबूरी जाहिर किया ।
" जब दिल किसी को चाहने लगता है तब चाह कर भी उसे कुछ और नहीं भाता" रूपा की कुछ ऐसा ही हाल था। वह करे तो क्या करे? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।बस दिल था जो अपने आप को तसल्ली दे रहा था कि-"कभी न कभी; कहीं न कहीं से;इक उम्मीद की रौशनी जरूर मुझ तक पहुँचेगी ।मेरा दामन भी; कभी न कभी ;खुशियों से भर जाएगी ।पर सवाल यह था? आखिर! कब?यह इंतजार कब तक?

श्री एस•एन•बी•साहब

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